Sunday, 2 February 2014

कोईलकारो आंदोलन जिंदा है और जिंदा रहेगा हमेशा...........





जसिन्ता केरकेट्टा

एक आंदोलन, जो झारखंड के इतिहास में आने वाले कई सालों तक विस्थापन के खिलाफ लड़ी जाने वाली कई आंदोलनेां के लिए एक माइलस्टोन रहा है, एक प्रेरणा रहा है। वह आंदोलन है कोईलकारो आंदोलन। जिस आंदोलन ने झारखंड में आदिवासियों में अपने समाज के लिए खड़ा होने और लड़ने का आत्मविश्वास भरा। जिसने आदिवासियेां को यह एहसास कराया कि उनकी इजाजत के बिना कोई उन्हें यूं ही उनकी जमीन से बेदखल नहीं कर सकता। 30 सालों के बाद आज कोईलकारो आंदोलन को लोग किस तरह देखते हैं। इस सवाल का जवाब 2 फरवरी को तपकरा गोलीकांड में 
शहीद हुए लोगों की याद में  शहीद दिवस पर लोगों का जुटान दे रहा था। चंद लोगों की भीड़, खाली-खाली सी आंखे बिना किसी बड़े सपने के। हल्की सी मायूसी और चेहरे पर उदासी। उस आंदोलन की आंच अब तपकरा में थोड़ी सी धीमी नजर आयी लेकिन हां एक संकल्प हर किसी ने लिया कि कोईलकारो आंदोलन की चिंगारी सदियों तक जिंदा रहेगी जो विस्थापन के खिलाफ आग लगाने को काफी होगी।  2 फरवरी 2001 को तपकरा गोलीकांड में आठ ग्रामीण मारे गए थे। निहत्थे लोगेां पर अचानक पुलिस ने गोली चलायी थी। हर साल यहां शहीद दिवस तो मनाया जाता है लेकिन आज तक सरकार ने उन लोगों को शहीद घोषित नहीं किया है। इसपर किसी ने सवाल खड़ा नहीं किया।
दयामनी बारला जिसने कोईलकारो आंदोलन में अपनी जवानी झौंकी थी। सुबह से ही बेतहाशा इधर-उधर सबको फोन कर याद दिला रही थी कि आज तपकरा में शहीद दिवस है। थोड़ा झुंझलाई सी..बौखलाई भी...। हर जगह से एक ही जवाब मिला कि कोई किसी न किसी काम में व्यस्त है। ऐसे में स्वयं ही गाड़ी लेकर एक महिला को लेकर वो तपकरा के लिए निकल पड़ी। तुपुदाना के समीप चौक पर आलोका, भुनेश्वर केवट और मुझसे उनकी मुलाकात हुई। हम भी उनकी गाड़ी में लटक गए। खूंटी से कुछ  और तोरपा से भी कुछ लोग गाड़ी में बैठे और फिर गाड़ी तपकरा के रास्ते पर दौड़ने लगी। देखा तपकरा के रास्ते पर चौड़ी सड़के बन रही हैं। ये रास्ते तपकरा में यूं ही तो नहीं बन रहे। 15 साल पहले दूर-दूर तक खेत और खाली जमीन पसरी हुई थी। लेकिन अब कुछ दूर तक इक्के-दुक्के घर नजर आ रहे हैं। गाड़ी धूल उड़ाती हुई आगे बढ़ रही थी। हमने धूल से बचने के लिए गाड़ी के शीशे चढ़ा लिए।
तपकरा में ठीक उसी स्थान पर पहुंचे जहां कभी भारी भीड़ जुटती थी कोईलकारो परियोजना के विरोध में, कुछ लोगों की पुरानी यादें ताजा हो गई। इस आंदोलन का हिस्सा बने लोग बताने लगे '' विशाल जनसमूह....वो वहां पेड़ के नीचे हम अपनी गाड़ी खड़ी कर पैदल उस स्थान तक पहुंचते थे जहां हमें लोगों को संबोधित करना होता था। वो विशाल पीपल का पेड़ अब भी वैसे ही खड़ा है मौन। हां यह पीपल का पेड़ काॅमरेड महेंद्र सिंह के जोशिले भाषणों को भी ऐसे ही मौन रहकर सुन चुका है। आंदोलन की एक-एक घटना का साक्षी। और इसने तपकरा गोली कांड में शहीद लोगों की शहादत भी देखी है।''  पीपल के इसी पेड़ के नीचे पंडाल लगा है। उसी के समीप आठ शहीदों की मिट्टी की कब्र है और एक विशाल पत्थर का स्मारक जिसपर उनके नाम अंकित हैं। आठ शहीदों में स्व.बोड़ा पाहन, स्व.जमाल खान, स्व प्रभु सहाय कंडुलना, स्व.सोमा जोसेफ गुडि़या, स्व.लुकस गुडि़या, स्व. समीर डहंगा, स्व. सुरसेन गुडि़या और स्व सुंदर कंडुलना शामिल थे। मुश्किल से भीड़ 300-400 लोगों की भीड़ होगी। लोगों ने रैली निकाली। रैली गांव का एक चक्कर लगाकर वापस उसी शहीद स्थल पर पहुंची जहां आठ शहीदों को श्रद्धांजलि देनी थी। रैली के दौरान बीच-बीच में दुकानों को बंद कर दुकानदारों को सहयोग देने की बात कही गई। कुछ दुकानदारों ने कहा इसकी सूचना पहले देनी चाहिए। बातें रफा-दफा हुई तो लोगों ने दुकानों के शटर गिराकर अपनी सहमती दर्ज कराई।
रैली शहीद स्थल पर पहुंची शहीद सुंदर कंडुलना की मां सालगी कंडुलना, उसकी ननद सुनिता गुडि़या और बोड़ा पाहन की बहु ने शहीद स्मारक पत्थर, जिसपर आठो शहीदों के नाम अंकित थे, उसे पहले पानी से धोया। उसपर सफेद धागे बांधे। चावल के आटे को पानी से घोलकर उसका छिड़काव किया। स्मारक पत्थर पर तेल का छिड़काव किया। तीन बार उसपर सरसों का तेल मिलाकर पिसे हल्दी का टीका लगाया। उसके बाद फिर तीन बार सिंदूर से टीका लगाया। फिर चावल को तीन बार उछालकर उसपर छिड़का। इसके बाद सफेद माला पहनाकर प्रणाम किया। फिर बारी-बारी से शहीदों के परिजनों के साथ अन्य लोगों ने भी फूलों की माला पहनाकर और धूप-अगरबत्ती जलाकर श्रद्धांजलि अर्पित की। फिर लोग उसी पीपल के पेड़ के समीप पंडाल के आगे दरी पर बैठ गए। पूरे कार्यक्रम का आयोजन कोईलकारो जनसंगठन ने किया था। 
 1955-56 से ही जब कोईलकारो आंदोलन शुरू हुआ जब हवाई सर्वे के बाद  कोईलकारो परियोजना की रूपरेखा तैयार की गई थी। बिहार राज्य विद्युत बोर्ड द्वारा यह परियोजना शुरू किया गया था। भू-अर्जन विभाग ने मापी किया और 1976-77 में काम शुरू हुआ। सर्वे के बाद जब लोगों को पता चला कि 256 रेवेन्यू गांव इसके अंतर्गत डूबेगें तब लोगों ने इसका विरोध करना शुरू किया। 1984 में उच्चतम न्यायालय में एक जनयाचिका दायर की गई कि सरकार सिर्फ एक गांव को माॅडल विलेज के रूप में खड़ा कर दिखाए। कमड़ा का कोचा गांव को माॅडल विलेज बनाने की शर्त रखी गई थी। आज तक वह माॅडल विलेज नहीं बन सका। सरकार इसमें असफल रही। लोगों ने कहा कि ऐसे में सरकार 250 गांवों का पूनर्वास कैसे करेगी। कोईलकारो आंदोलन के 30 साल के बाद भी आज लोग हर साल तपकरा में 5 जुलाई को संकल्प दिवस के रूप में जुटते हैं और 2 फरवरी को शहीद दिवस के रूप में एकत्रित होकर कोईलकारो आंदोलन की यादों को फिर से जिंदा करते हैं और जान देने लेकिन जमीन न देने की बात कहते हैं।
  बातें बहुत हो रही थी। बारी-बारी से एक के बाद एक लोग मंच से भाषण दे रहे थे। इधर भाषण देने वालों की संख्या ज्यों-ज्यों बढ़ रही थी उधर भीड़ धीरे-धीरे छंट रही थी। 4.00 बजते-बजते दरी पर चंद महिलाएं बची रह गई और किनारे-किनारे बैठे पुरूष चुपचाप खिसक गए। बची-खुची चंद महिलाएं जो धीरज का परिचय दे रहीं थी उनके बीच शहीद सुंदर कंडुलना की मां सालगी कंडुलना बैठी हुई थी। पास जाकर बैठने और बात करने की कोशिश करने पर वो मुंडारी में अपनी आपबीती सुनाते हुए कहती हैं कि सुंदर उनका सबसे बड़ा बेटा था। गोली मारने के बाद उसकी मौत के मुआवजे के रूप में कुछ पैसा उन्हें मिला था। कितना? पूछने पर वो कहती हैं, ’’ नहीं मालूम ’’। उसके चार बेटे हैं उसमें से दो पढ़ाई कर रहें हैं। पति के साथ मिलकर वो खेती-बारी का काम करती हैं और साल भर खाने को आनाज हो जाता है। बेटे ने कोईलकारो आंदोलन में जान दिए, इस आंदोलन की यादें जेहन में गड़ गई हैं। फिर वो मौन हो जाती है।
तपकरा गोली कांड के वक्त गांव का एक फौजी सुलेमान जिसने कंबोडिया और मलेशिया में भी बतौर फौजी काम किया है। देश का कोई राज्य नहीं छूटा है जहां उसने भ्रमण न किया हो। वे तपकरा गोली कांड की आंखोदेखी घटना का जिक्र करते हैं - ’’ उन दिनों मैं गांव आया हुआ था। अपने बड़े बेटे की शादी करनी थी। दूसरे गांवों में न्योता बांट कर लौट ही रहा था कि लोगों ने बताया गोली चली है और आठ लोग मरे हैं। यह सुनते ही गांव के कई लोगों के चेहरे आंखों के सामने घूमने लगे थे। कोईल कारो नदी के पानी के लिए सरकार ने तपकरा में लोगों के खून बहाए। ’’ 

 इधर सुलेमान, शहीद सुंदर की फुफू सुनिता गुडि़या और दूसरे लोग पुरानी यादें बांटते हैं....और उधर स्थानीयता पर, झारख्ंाड की राजनीति पर, आदिवासियों के विकास पर भाषण चलता रहता है......। दयामनी दहाड़ रहीं थी ’’ मुंडाओं को डूबाने का काम किया जा रहा है। पूरे राज्य में सिर्फ डैम ही डैम बनेगा तो लोग डूबेंगे या बसेंगे? हम विकास चाहते हैं कि चांडिल डैम का पानी हमारे खेतों तक पहुंचे। कोईल कारो नदी का पानी हमारे मुरझाए जंगलों को, खेतों को हरा भरा बनाए। ’’
फादर स्टेन स्वामी ने कांपते हाथों से माइक पकड़ ली और कहा कि यहां के लोगेां को मारने के कई तरीके अपनाए जा रहे हैं। हर राज्य में स्थानीयता नीति बनी है लेकिन आज तक झारखंड में स्थानीयता नीति नहीं लागू की जा रही। दो लाख नौकरियां हैं और आदिवासी यूवक बेरोजगार घूम रहे हैं। यह एक साजिष है।

 विजय गुडि़या ने कोईलकारो आंदोलन की यादों को ताजा करते हुए कहा जब तक सरकार गजट पारित कर विधिवत घोषणा नहीं करती कोईलकारो परियोजना की समाप्ती का। हमारा संघर्ष चलता रहेगा......चलता रहेगा हमेशा.....।शाम हो रही थी। हम वापस लौट रहे थे और फिर सड़कों की चैड़ाई पर नजरें अटक जाती हैं। सरकार यूं ही पैसा नहीं बहा रहीं सड़कों के चैड़ीकरण पर। कोई तो इरादा है....बातें अब भी खत्म नहीं हुई है। फिर किसी साजिश की बू धूल के साथ उड़-उड़ कर हमारे नाक में दम कर रही थी। कोईलकारों आंदोलन शायद कभी नहीं खत्म होगा। वो जिंदा है आज भी और जिंदा रहेगा हमेशा..... .....।

No comments:

Post a Comment