Friday, 14 February 2014

हमदर्दी

हमदर्दी
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ओ री चंपु
तुम्हारे आंगन में वो शक्स कौन है
जो आकर बैठता है घंटों और
तुम चाय-नाश्ता रसोई में बनाती हो
जो बेखबर होता है इस बात से कि
कैसे तुम बगल वालों के घर के चुल्हे से
अपने घर का चुल्हा जलाती हो,

ओ री चंपु
वो जो तुम्हारे संघर्ष पर बतियाता है
कैसे तुम अंतरद्वंद्व की नदी में अकेले
नाव लेकर आंधी तूफां झेलती हुई चलती हो
अपने ही मानसिक समय के चक्र में फंसी
तुम भूत और भविष्य के फंदों के बीच डोलती हो
होगा कुछ नहीं हासिल यूं बोलकर फिर भी
दिल की बात खुलकर बोलती हो,

ओ री चंपु
अपने ही घर में
जन्म लेने के बाद त्याग दिए गए
उन आधे बच्चों को अपनी पीठ पर बांधकर
कच्ची उम्र में बादलों से भरे आकाश में अकेली
उड़ने की कोशिश में अपने डैने फड़फड़ाती हो
पीठ पर बंधे उन चूजों को दाने खिलाने को
आर्थिक तंगी की अंधेरी रात में उजाले के लिए
अपने सपनों को तुम आग लगाती हो
उस आग से अपनी गांठ में बचे-खुचे अधजले
चंद कागज के रूपयों को
उन चूजों के भविष्य के लिए जबरन बचाती हो
तुम्हारे संघर्ष की इन्हीं कहानियों पर
कायल खुद को वो शक्स बताता है
फिर भी तुम्हारी गांठ से चंद रूपये
चालाकी से निकाल कर अपना काम बनाता है
और तुम्हें लगता है
तुमसे कोर्इ हमदर्दी जताता है।।

जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 13.2.2014

स्त्री देह की खूबसूरती के मायने

स्त्री देह की खूबसूरती के मायने
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जीवन संघर्ष में उब - डूब होती
तुम्हारी मजबूत, सशक्त काया की
नहीं होगी कहीं चर्चा
क्योंकि तुम्हारा यौवन अब
समर्पण नहीं, संघर्ष करता है मझधार से,

तुम्हारी जुल्फें उलझी हुई हैं विपरीत
परिस्थिति रूपी वृ़क्ष की टहनियों से
और तुम रचे गए इस परिस्थितियों से
अपनी उलझी लटें छुड़ाने को
काट डालती हो उन टहनियों को
इसलिए नहीं होगी अब चर्चा तुम्हारे जुल्फों की,

तुम अपनी आंखों में काजल रूपी रात
के बाद भोर की लालिमा लिए हर दिन
एक सूरज लेकर उगती हो क्षितिज से
तेज किरणों सा अंगार लिए फिरती हो
जिसके ताप से पास आने वाले झुलसते हैं, इसलिए
अब नहीं होगा तुम्हारे नैनों के सौंदर्य का जिक्र,

तुम विरोध करती हो समाज की उन तमाम
हथकंडों का जो तुम्हें सजा-संवार कर
देवी की भांति रखना चाहते हैं मंदिरों में
क्योंकि अब तुम सड़कों पर उतरती हो
नंगे पांव चलती हो नकार कर
तुम्हारे लिए बनाए फूलों की कोमल सेज को
इसलिए अब नहीं होगा तुम्हारे नख-शिख का वर्णन,

तुम मशालें जलाती हो समाज के सोए लोगों के लिए
नीदें खराब करती हो रह-रहकर
रौद्र रूप लिए दहाड़ती हो शहरों में, जंगलों में
ऐसे में मुश्किल है अब तुम्हारी बलखाती कमर
सुनहरी रंगत, उड़ती हुई जुल्फों की तारीफ करना,

अब तक जो भी था तुम्हारे सौंदर्य का चित्रण
तुमने स्त्री देह की खूबसूरती के सारे मायने बदलकर
संघर्ष से अपनी खूबसूरती के किस्से खुद गढ़ लिए हैं।।

जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 12.2.2014

टूटते पहाड़ और टूटती जिंदगियां


टूटते पहाड़ और टूटती जिंदगियां

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पहाड़ के पहाड़ दे दिए जाते हैं
यहां लीज पर
लीज मिले पहाड़ों के सीने पर
होता है हर रोज विस्फोट
एक पहाड़ अब बन जाता है कोई खंडहर
उन खंडहरों में एक उम्र गुजारती हैं
परित्यक्त, विधवा, एकल, गरीब महिलाएं
पत्थर तोड़ती हुई धूल-कणों को सूंघते हुए
खंडहर के अंदर रिसते पानी को पीते हुए
किसी कालेपानी की सजा सी, धीमी मौत मरने को,

हर धमाके के साथ पहाड़ों के बीच टूटती हैं
उन महिलाओं की जिंदगी भी, जो जानती हैं
लंबे अरसे से वहां काम करते-करते
चंद पैसे और एक गंभीर बीमारी के सिवा
अंततः कुछ भी उनके हाथ नहीं बचेगा
महिलाएं जो करती हैं परिवार व बच्चों के लिए
चंद पैसे के बदले फेफड़े में धूल भरने का सौदा
महसूस करती हैं पहाड़ और उनकी स्थिति
एक सी हो गई है जैसे दोनो बेजुबां से,

पहाड़ टूटते हैं पर कुछ बोल नहीं सकते
जो बोल सकते हैं वो अपना मुंह नहीं खोलते
बस देखते हैं टुकुर-टुकुर कैसे कोई
पहाड़, जंगल, जमीन को ट्रकों पर लादकर
ले जा रहा एक मजबूत घर जमाने को
जो कहते हैं खुद को रखवाले, कैसे वो लोग
इन जंगलों-पहाड़ों की खूबसूती देकर किसी गैर को
देखो हाथ हिलाते हुए निकल जाते हैं हर साल
देश के दूसरे भागों में पहाड़ी सैर को ।।

जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 6.2.2014

क्यों नहीं होता मलाल

क्यों नहीं होता मलाल
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हर साल इस देश की गलियों से निकलकर
हजारों लोग जाते हैं विदेश रंगीन सपने लिए
किसी भारतीय को अगर किसी गोरे ने मार दी चाकू
मानवता चीखती है अपने देश के हर कोने से
देशभक्ति की लहू टपकती है इस देश के सीने से
छिड़ जाती है बहस भारतीयों की सुरक्षा पर
हर कोई टिप्पणी करता है गोरों के नस्लभेदी रवैये पर,

हमारे गांव से निकलकर फूलो भी जाती है
अपने ही देश के किसी शहर में, जहां
चाकू से गोद दिया जाता है उसका चेहरा
बिगाड़ दिया जाता है इंसानी शरीर का नक्शा
इसी देश में नस्लभेदी, संवेदनहीन लोगों द्वारा,
मसल दिया जाता है उन पलाश के फूलों को
जो बिखरी होती है महानगर के हर घर में
जंगल से निकल कर मेहनत के रंग से
उनके घर की चारदिवारियेां को रंगती हुई,

खरीद लिया जाता है उसका कोख
एक ही घर के सारे मर्दो द्वारा
जलाने को चिराग अपने वंश का
उस फूलो की जिंदगी की लौ बुझाकर
लौट आती है वो अपने घर वापस
जब नुचे-खुरचे, चिथड़े-चिथड़े हो चुके
अपनी आत्मा के टुकड़ों को समटते हुए
किसी जिंदा लाश की तरह चलती हुई
तब देश के कोने-कोने से नहीं उठता
ऐसी ही हजारो फूलो की सुरक्षा पर सवाल
नस्लभेदी, संवेदनहीन देश के लोगों को
क्यों नहीं होता अपनी करतूतों पर मलाल।।

जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 01.02.2014

सुगना की कब्र और मड़ुआ का अंकुर

सुगना की कब्र और मड़ुआ का अंकुर
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गांव के किसी मिट्टी के टीले पर
कोई अंकुर निकला है मडुआ का
वो सिर्फ मिट्टी का टीला नहीं है
भूख से मर गये गांव के
सुगना की कब्र है वो
उसी मिट्टी की गोद में
डर कर छिपा मडुआ का बीज
अब उग आया है शीत पानी से भींग कर,

उसके अनाथ बच्चे छटपटाते हैं
गोबर पानी से लिपे आंगन में
कच्ची मिटटी के ठंडे चुल्हे पर
उग आए धान के अंकुरों को देखकर,
विधवा पत्नी उसके जाने के बाद
उबड़ाकर रखे खाली डेकची के
काले पेंदे को देखती है जैसे
भूख की आग में झुलसकर,

लेकिन इस बार सुगना की पत्नी और बच्चे
भूख से नहीं मरेंगे पर आत्महत्या जरूर करेंगे
क्योंकि जानते हैं वो भूख से मरना
किसी के लिए बहस का कोई मुद्दा नहीं
आत्महत्या से कम से कम इतनी गारंटी तो है
कि उनकी लाशें छपेंगी सभी अखबारों में
मौत के कारणों की पड़ताल के लिए
उसके घर के साथ होगी और भी
गांव के कई ठंडे चुल्हों की तलाशी
उनकी लाशें दुनियां को बता सकेंगी
उन चंद खास भूखे लोगों की दास्तान
जो लाखों वोट और करोड़ो नोट डकारकर
अब भी जीते हैं चुनाव में नई जीत के लिए
और अंधेरे कमरे में तड़पकर कैसे
मर जाता है सुगना भूख से

सुगना की आवाज कब्र से निकल कर
बाहर दुनियां तक पहुंचेगी जरूर
यही कहने को उग आया है
कब्र पर, वो मड़ुआ का अंकुर ।।
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- जसिन्ता केरकेट्टा
Date -25.1.2014

आग तो लगानी होगी

आग तो लगानी होगी
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वो हर दिन निकल जाता है
नरभक्षी कंक्रीट के जंगल में खटने को
बदले में मिल जाता है उसे
कुछ भ्रम के सुनहरे सिक्के
जिसकी चमक में लौटकर घर
वो देखता है.........
अपने बदन की हड्डियों से
मांस को गायब होते हुए
रफ्ता-रफ्ता अपने मस्तिष्क से
रचनाशीलता को छटपटा कर मरते हुए
चुंकि उन्हीं सिक्कों से मिल रहा एक विश्वास
उसे अपने पेट में अन्न डाल सकने को
इसलिए हर रोज वो जाता है
नरभक्षी कंक्रीट के जंगल में खटने को,

नरभक्षी जड़े चूसती हैं उसकी सारी शक्ति
ताकि निर्बाध....
फलने-फुलने और फैलने का
निरंतर चलता उसका यह धंधा रहे
एक झीना जाल सा बिछा होता है
भ्रम की विशाल रोशनियों का वहां
ताकि मजबूरी की हथेलियों पर गिरे
भ्रम के सिक्कों की चमक के नीचे ही
अपने शोषण के प्रति वो ताउम्र अंधा रहे
उस रोशनी के पीछे होती है
एक षडयंत्रकारी व्यवस्था, जिसमें
रोटी के टुकड़ों का इतना निवाला भर उसे
मिलता रहता है एक निष्चित समय तक
जिससे वो
कल फिर काम पर आने को जिंदा रहे।।

नरभक्षी कंक्रीट के जंगल का विस्तार देखो
इस छोर से उस छोर तक फैल रहा है
उस विस्तार का खुद को भी हिस्सा मानकर
वो भ्रम में अंधा मुस्कुराता है
अंदर ही अंदर मगर छटपटाता है
अपने बदन पर लिपटे शिंकजे की तरह
उन मजबूत जड़ों को काटने को
उसे कभी तो हिम्मत जुटानी होगी
अंगार जो जल रहा है उसके अंदर कहीं
उसी अंगार से इस नरभक्षी जंगल में
अब आग तो लगानी होगी।।
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जसिन्ता केरके्टा
दिनांक 15.1.2014

मेरी कविता ''आग तो लगानी होगी'' का नेपाली भाषा में अनुवाद

Raja Puniani जी को बहुत धन्यवाद। मेरी कविता ''आग तो लगानी होगी'' के नेपाली भाषा में अनुवाद के लिए।

Raja Puniani
.......................
आगो त लगाउनै पर्नेछ
- जसिन्ता केरकेटा

हर दिन निस्कन्छ
नरभक्षी कङ्क्रिटको जङ्गलमा खटिनलाई
सट्टामा पाउँछ
भ्रमका केही सुनौला सिक्का
जसको चमकले रन्थनिएर घर फर्किएपछि
देख्दछ उसले -
आफ्नो शरीरका हड्डीबाट
मासु गायब हुँदै गरेको
बिस्तार मस्तिष्कबाट
रचनाशीलता छटपटाउँदै मरिरहेको।

ती सिक्काबाटै पेटमा अन्न हाल्न सकिने
विश्वास पाइरहेको हुन्छ
त्यसैले ऊ हर दिन जाँदछ
नरभक्षी कङ्क्रिटको जङ्गलमा खटिन।

नरभक्षी जराले चुस्दछ उसको डल्लै शक्ति
ताकि निर्बाध...
फल्दो-फुल्दो र फैलिँदो
निरन्तर चल्दो उसको यो धन्धा जियालो रहोस्
- त्यहाँ भ्रमको बड़ेमानको प्रकाशको
एउटा झीनो जालजस्तै ओछ्याइएको हुन्छ
ताकि बाध्यताको हत्केलामाथि खसेको
भ्रमका सिक्काको चमकमुनि नै
आफ्नो शोषणप्रति ऊ आजीवन अन्धो रहोस्
त्यस प्रकाशको पछिल्तिर हुँदछ
एक षड़्यन्त्रकारी व्यवस्था, जसमा
रोटीका टुक्राको यति गाँस त उसले
पाइरहँदछ एक निश्चित समयसम्म
जसले गर्दा ऊ
भोलि फेरि काममा आउनलाई जिउँदो रहन सकोस्।

नरभक्षी कङ्क्रिटको जङ्गलको विस्तार त हेर
यो छेउदेखि त्यो छेउसम्म
आफूलाई पनि त्यस विस्तारको हिस्सा मानेर
ऊ भ्रममा अन्धा भएर मुस्कुराउँदछ
भित्र-भित्रै तर छटपटाउँदछ पनि
आफ्नो जीउमा लपेटिएको साङ्लोजस्तै
ती बलियो जरालाई काट्न
उसले पनि कहिल्यै त आँट जुटाउनै पर्नेछ।

कोइला जुन जल्दैछ ऊभित्र कतै
त्यही कोइलाले यस नरभक्षी जङ्गलमा
अब आगो त लगाउनै पर्नेछ।
- नेपालीमा अनुवादः राजा पुनियानी
(केरकेट्टा झारखण्डकी एक पत्रकार हुनुहुन्छ। मूल हिन्दीमा लेखिएको तिनको यो सशक्त कविता फेसबुके नेपालीभाषी साथीहरूका निम्ति ...)

पंचायत प्रतिनिधि बनकर क्यों हैं शर्मिंदा....

जसिन्ता केरकेट्टा, रांची

खूंटी जिले के कर्रा प्रखंड का जंगलों के भीतर छोटा सा गांव बिलसेरेंग
झारखंड राज्य में पंचायत चुनाव के तीन साल पूरे हो चुके हंै। लेकिन आज जो जनप्रतिनिधि बनकर पंचायतों में काम कर रहे हैं वो खुद पर शर्मिंदा हैं। पंचायत प्रतिनिधि कहते हैं कारण कुछ भी हो लेकिन चुनाव जीतने के बाद जिस उत्साह से हमने गांव-गांव घूम कर गांव के विकास के सपने ग्रामीणों को दिखाए थे। उनका हौसला बढ़ाया था। आज हमें उनके सामने शर्मिंदा होना पड़ता है। राज्य में 32 सालों के बाद यह पंचायत चुनाव करवाया गया लेकिन आज धरातल पर विकास के नाम पर पंचायतों में अफसरशाही हावी है। राज्य  में पंचायत चुनाव 2010 में संपन्न हुआ और पंचायत प्रतिनिधि बनाये गए। लेकिन हकीकत यह है कि भ्रष्टाचार के कीड़ों से पंचायतों में विकास की जमीन खोखली हो रही है।
  इस चुनाव के बाद पंचायतों में ग्रामसभा को पूरी शक्ति दी जानी थी। पर ग्रामसभा सरकारी पदाधिकारियों के हाथ की कठपुतली बन गई। चुनाव के बाद मुखिया, उपमुखिया बनने वालों ने उत्साह में घूम-घूम कर लोगों को आश्वासन दिया कि अब गांवों में विकास की लहर आ जाएगी। लेकिन तीन सालों में ही उन्हें पंचायती राज व्यवस्था की हकीकत पता चल गई। आज मुखिया, उपमुखिया खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं।
ग्रामसभा पंचायत की समस्याओं के बारे में अधिकारियों से कहीं अधिक जानकारियां रखती हैं। पर जब ग्रामसभा ने अपनी ओर से योजनाएं बनाकर सरकार के पास भेजी, तो सरकारी स्तर से उन योजनाओं को सिरे से खारिज कर दिया गया। इसके बदले सरकार ने अपने हिसाब से योजनाएं बनाकर पंचायतों में भेजनी शुरू की। ग्रामसभा का काम सिर्फ इतना रह गया कि सरकार की ओर से आयी योजनाओं का अनुपालन कराये। जनप्रतिनिधियों का सवाल है गांव की वास्तविक जरूरतों को नजरअंदाज कर अपने अनुसार विकास के मायने गढ़ने थे और योजनाओं को लागू करना था तो फिर हमारी भूमिका क्या रह जाती है।  यदि यही करना था, तो पंचायत चुनाव किसके लिए कराए गए ? पंचायतों के विकास के नाम पर केंद्र से राज्य तक राशि लाने और उस राशि का योजनाओं के नाम पर बंदरबांट करने के लिए ? अब लोगों को संदेह होता है कि क्या सचमुच पंचायातों के विकास के लिए ही पंचायत चुनाव कराए गए थे? यदि विकास के नाम पर पंचायत चुनाव हुए, तो पंचायतों में विकास के नाम पर क्या है? वहां अधूरे काम, बेरोजगार युवा, निराश पंचायत प्रतिनिधि भर रह गए हैं।
खूंटी जिला परिषद अध्यक्ष मायालीना टोपनो कहती हैं कि कृषि विभाग का हस्तक्षेप रोकने के लिए गत साल ही डीसी को पत्र दिया गया था कि पंचायत के कार्यो में हस्तक्षेप रोका जाए। पर डीसी ने अब तक कोई निर्णय नहीं लिया न इस बाबत उनका कोई पत्र अब जिला परिषद अध्यक्षों को मिला है। पंचायतों को सरकारी विभागों के हस्तक्षेप से मुक्त कर पूरी शक्ति सौंपनी जरूरी है। लेकिन इस राह में बाधा उत्पन्न करने की कोशिशें लगातार की गयी हैं।
खूंटी जिले के कर्रा प्रखंड की प्रमुख मंजुला कहती हैं कि एक योजना की पूरी राशि लाभुकों को दिये बिना नई योजनाओं की राशि का वितरण किया जाता है। पहली योजना की बाकि राशि कहां चली जाती है इसका हिसाब देने वाला कोई नहीं। वो कहती हैं कि हर योजना को पर पूरा किया जाये उसके बाद ही नई योजनाओं पर काम शुरू हो। कई योजनाएं सिर्फ कागजों पर पूरी दिखा दी जाती हैं।
कच्चाबारी पंचायत के उपमुखिया हाबिल कच्छप कहते हैं कि गांव की ओर से भेेजी गयी योजनाओं को खारिज कर दिया गया। पंचायतों पर अफसरशाही हावी है। हमारी योजनाएं उन्हें पसंद नहीं। सरकारी स्तर की योजनाओं को ग्रामीणों पर लादा जा रहा। वैसी योजनाओं का गांव के वास्तविक विकास से कोई लेना-देना नहीं है। मसलन पंचायत में एक गांव से दूसरे गांव को जोड़ने के लिए सड़कें चाहिए थी। पुरानी सड़कों का मरम्मत होना था। आवागमन की सुविधा बेहतर होने से ग्रामीण बाजार से जुड़ते। अब कुंआ बनाने का काम तेजी से चल रहा है। सब्जियां तो उगाई जा रहीं हैं, लेकिन उन्हें बाजार तक पहुंचाने के लिए एक अदद दुरूस्त सड़क तक नहीं। एक योजना दी जा रही है, वहीं कोई दूसरी योजना रोक कर कहीं न कहीं विकास भी बाधित किया जा रहा है। इससे प्रतीत होता है कि पंचायती राज व्यवस्था में पंचायतों का सर्वांगीण विकास मुख्य मकसद नहीं है।
वार्ड सदस्य संतोष परधिया कहते हैं कि सरकारी स्तर पर फंड के पैसों का बंदरबांट हो रहा और गांव वाले पंचायत प्रतिनिधियों पर आरोप मढ़ते हैं कि पैसा हम खा रहे हैं। हमारे लिए तो जन प्रतिनिधि होना अपमान का विषय बन गया है। इससे बेहतर था कि हम एक आम व्यक्ति की तरह इज्जत की रोटी खाते थे। गांव में सिर्फ चौपाल, चबूतरा बनाने का काम चल रहा, जो गांव वालों की पहली प्राथमिकता नहीं है। कृषि, पशुपालन, सड़क की व्यवस्था जैसी जरूरी बातों की जगह भूमि समतलीकरण, चबूतरा, चौपाल बनाकर विकास का दावा किया जा रहा।
वहीं दूसरी ओर एक नजारा यह भी है कि सुदूर इलाकों में लोग चंद योजनाओं को भी ''वरदान'' की तरह देख रहे। जहां इससे पहले कभी विकास की रोशनी नहीं पड़ी थी। कर्रा प्रखंड के छाता पंचायत के बिलसेरेंग गांव में उपमुखिया जकरियस रहते हैं- यह गांव पूरी तरह जंगल के अंदर है। गांव पूरी तरह से नक्सलप्रभावित क्षेत्र में आता है। यहां करीब 536 की आबादी है। पंचायत चुनाव से पहले इस गांव तक कभी विकास की रोशनी नहीं पड़ी। गांव से शहर तक जाने के लिए बेहतर रास्ता नहीं था। लोग खेतों की पगडंडियों से होकर ही जाते थे। कुंआ, तालाब आदि के न होने से सिंचाई की समस्या थी। लेकिन आज कम से कम कुंआ बनने, तालाब बन जाने से लोगों को खेती करने में काफी सुविधा मिल रही है।
वहीं उसी पंचायत में कुरसे गांव ऐसा है, जहां सरकार के अनुसार एक ही परिवार गरीब है और बाकी संपन्न। क्योंकि इस गांव से भेजे गए कई आवेदनों में सिर्फ एक को ही बीपीएल कार्ड मिला है। जिसके कारण गांव के कई लोगों को इंदिरा आवास, राशन कार्ड, वृद्धा पेंशन, परिवारिक लाभ नहीं मिल पा रहा है। हर योजना में बीपीएल होना जरूरी माना जाता है। ऐसे में सिर्फ और सिर्फ बीपीएल कार्ड नहीं होने के कारण लोग न तो राशन कार्ड बन पा रहा है और न ही कोई अन्य सुविधाएं लोगों को मिल रही है। यही स्थिति इस पंचायत के सावड़ा गांव में भी है। वहां भी सौ-दो सौ लोगों के बीच मात्र छह को ही बीपीएल कार्ड प्राप्त हुआ है।
पंचायत चुनाव में फिर बतौर मुखिया, वार्ड सदस्य के रूप में खड़े होने की बात पूछने पर आधे से अधिक मुखिया कहते हैं कि जनप्रतिनिधि बनकर गांववालों के सामने हम शर्मिंदा हैं। हमने जो वादा किया था उन वादों पर हम खरा नहीं उतर पा रहे ऐसे में प्रतिनिधि बनकर फिर से ग्रामीणों को झूठे सपने दिखाना कहां तक सही है? लेकिन कुछ मायूस होकर कहते हैं कि लेकिन अधूरे कामों को पूरा करने की जिम्मेवारी कौन लेगा। इसलिए पंचायत प्रतिनिधियों को विवेकपूर्ण निर्णय लेना होगा।

Thursday, 13 February 2014

पत्थरों के बीच टूटती जिंदगी



जसिन्ता केरकेट्टा, रांची
                                     ’’ पहाड़ के पहाड़ दे दिए जाते हैं
                                                 यहां लीज पर
                                      लीज मिले पहाड़ों के सीने पर
                                        होता है हर रोज विस्फोट
                                एक पहाड़ अब बन जाता है कोई खंडहर
                                उन खंडहरों में एक उम्र गुजारती हैं
                             परित्यक्त, विधवा, एकल, गरीब महिलाएं
                             पत्थर तोड़ती हुई धूल-कणों को सूंघते हुए
                            खंडहर के अंदर रिसते पानी को पीते हुए
                         किसी कालेपानी की सजा सी, धीमी मौत मरने को ’’
ये चंद पंतियां हैं मेरी ’’ टूटते पहाड़ और टूटती जिंदगियां ’’ शीर्षक कविता की। जिसमें मैंने उन महिलाओं की स्थिति को स्पष्ट करने की कोशिश की है। जो बचपन से पत्थर खदानों में काम करने को मजबूर हैं। ऐसी महिलाएं प्रायः विधवा हो चुकी हैं, परित्यक्त हैं या जिनके परिवार में पुरूष बीमार हैं या काम पर नहीं जाते। झारखंड में कोई ऐसा जिला नहीं है जहां पत्थर खनन का काम नहीं चल रहा और खास कर अवैध तरीके से। इसमें राज्य के उच्च पदों में विराजमान परिवार के सदस्य तक शामिल हैं। पहाड़ के पहाड़ लीज पर दे दिए जा रहें हैं। और आस-पास की महिलाएं अपना पूरा जीवन इन खदानों में लगा रही हैं। इन स्थानों पर सबसे ज्यादा महिलाएं काम पर लगी हुई है। पत्थर खदानों में काम करने वाली इन महिलाओं की जिंदगी भी पत्थरों के साथ टुकड़ों में टूटती है हर रोज। बम के धमाके के बीच वे अपनी जिंदगी में भी एक धमाका सा महसूस करती है लेकिन इसके पीछे कई कारण हैं जिनके कारण वे पत्थर खदानों में काम करने को मजबूर हैं।
झारखंड में पत्थर खदानों में सबसे ज्यादा महिलाएं काम कर रही हैं। पत्थर खदान में जहां दो - तीन पुरूष नजर आएंगे वहीं 10 से 15 महिलाएं काम करती नजर आएंगी। इसके कारणों की पड़ताल करने की भी जरूरत है कि महिलाएं ही पत्थर खदानों में सबसे ज्यादा क्यों हैं? महिलाओं के खदान में आने से कई बार उनके स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे भी कार्यस्थल पर आ जाते हैं। महिलाएं कई बार अपने साथ अपने नन्हें बच्चों को भी लेकर आती हैं। पास ही बच्चों को लिटाकर वे काम करती हैं। जो कि न केवल एक मां के लिए बल्कि उसके बच्चे के लिए भी खतरनाक है। पत्थर की तुड़ाई जब मशीनों से होती है तो काफी मात्रा में धूल-गर्द उड़ता है। पूरा माहौल धूल-गर्द से भर जाता है। अनजाने ही इसके शिकार आस-पास लिटाए नन्हें बच्चें भी होते हैं। पत्थर खदानों में काम करने वाली महिलाएं जानती हैं कि धीरे-धीरे धूल-गर्द से उन्हें बीमारी हो सकती है लेकिन दूरस्थ परिणामों के बजाय उन्हें वर्तमान की आर्थिक तंगी नजर आती है। झारखंड में कई पत्थर खदान और क्रशर काफी लंबे समय से चल रहे। कई महिलाएं ऐसी हैं जिन्होंने बचपन से काम करते हुए अपनी जिंदगी का आधा पड़ाव पत्थर खदान में ही गुजार दिया। उन्हें लगता है रोज-रोज शहर जाकर वहां चैराहे पर खड़े होकर काम की तलाश करने से अच्छा है कि वे पत्थर खदानों में ही काम करंे। इससे कम से कम उन्हें परिवार चलाने के लिए पैसे तो मिल जाते हैं और दूर जाने की जरूरत भी नहीं पड़ती है। यही वजह है कि महिलाएं अपने गांव के आस-पास के पत्थर खदानों में सारी परेशानियों के बाद भी काम करने को तैयार हो जाती हैं।
यहां काम करने वाली महिलाएं शारीरिक, मानसिक, समाजिक और आर्थिक  रूप से कमजोर और असहाय नजर आती हंै। जहां महिलाएं स्टोन क्रशर में धूल के बादलों के बीच मुंह छुपा-छुपा कर चोरी-चोरी से धूल को अपने फेफड़े में डालते हुए जीती हैं। वहीं एक-एक पत्थर खदान के मालिक झारखंड से पूरे पहाड़ों को ही पत्थर खदान के रूप में तब्दील कर उसे खंडहर बना रहा है। स्वयं करोड़ों की कमाई कर रहे और ग्रामीण महिलाओं की जिंदगी पत्थर खदानों के खंडहरों में ही दफन हो रही है।
                               ’’ हर धमाके के साथ पहाड़ों के बीच टूटती हैं
                                  उन महिलाओं की जिंदगी भी, जो जानती हैं
                                   लंबे अरसे से वहां काम करते-करते
                                  चंद पैसे और एक गंभीर बीमारी के सिवा
                                अंततः कुछ भी उनके हाथ नहीं बचेगा
                             महिलाएं जो करती हैं परिवार व बच्चों के लिए
                            चंद पैसे के बदले फेफड़े में धूल भरने का सौदा
                             महसूस करती हैं पहाड़ और उनकी स्थिति
                             एक सी हो गई है जैसे दोनो बेजुबां से ’’
अनगड़ा प्रखंड में लामकाबेड़ा में 20-25 सालों से चल रहे पत्थर खदान में लंबे समय तक काम करने वाली करमी कहती हैं कि पत्थर तोड़ने के लिए जब धमाके किए जाते हैं तो पहाड़ के पास ही बना उसका झोपड़ा हिल जाता है। घर बुरी तरह स्टाॅन क्रशर से उड़ते धूल-गर्द की सफेदी से पुता हुआ है। अतरी देवी कहती हैं कि जो हाजिरी में काम करती हैं उनको गुड़ मिलता है लेकिन जो ठेका में काम करती है उनको गुड़ नहीं मिलता। जबकि नियम के अनुसार क्रशर में काम करने वाली महिलाओं को बीमारी से बचने के लिए गुड़ दिया जाना अनिवार्य है। फूलो इस खदान में काम करने वाली सबसे पुरानी आदिवासी महिला है। वह बचपन से काम कर रही है और अब उसकी शादी भी हो गई है। वह कहती हैं कि खंडहरनुमा पहाड़ के अंदर ही पानी रिसता है। जिसका उपयोग महिलाएं पीने के पानी के रूप में करती हैं।
नामकुम प्रखंड के महिलौंग स्थित स्टोन क्रशर में खुशी मुंडा जिसकी उम्र महज 10 साल होगी काम करती है। खुशी कच्ची उम्र में अपनी मां को आर्थिक मदद देने के लिए काम कर रही है। इससे पहले वह बचपन से शहरों में घरेलू कामगार का काम करती थी। जब थोड़ी बड़ी हुई तो रेजा का काम करती थी। लेकिन अब अपने गांव के पास ही स्टोन क्रशर में पत्थर तोड़ने, ढोने का काम कर रही। खुशी की मां विधवा है और उसके दो बड़े भाई हैं। एक छोटा भाई भी है जो दूसरों के घरों में काम करता है और वह शहर में उन्हीं लोगों के घर में ही रहता है। गांव में एक कमरे वाला एक मिट्टी का घर है। जिसमें एक रसोई रूम है और दूसरा एक कमरा है। जहां वह कुछ किताबे लेकर राम में पढ़ती है। रसोई रूम में ही वह अपनी मां के साथ सोती है। उसके घर में न तो ठंड से बचने के लिए कंबल है न ही कोई बेड। खुशी की मां बालो मुंडा की उम्र 65 है। वह 15 साल से स्टोन क्रशर में काम कर रही है। अपनी पूरी जिंदगी क्रशर में काम कर वह गुजार रही है। उसकी मां की कमाई से पूरे परिवार का खर्च निकलता है। इन दिनों खुशी और उसकी मां दोनों मिलकर परिवार के खर्चे चला रहें। दूसरी ओर खुशी के दो भाई हैं जो कुछ नहीं करते। वो इधर-उधर भटकते हैं और आवारागर्दी करते हैं। मां-बेटी की कमाई से पूरे परिवार का खर्च चल रहा है। तुपुदाना प्रखंड स्थित बिरचनद्वार सिंह के स्टोन क्रशर में काम करने वाली करीब 15-20 महिलाएं हैं। जिसमें आधे से अधिक महिलाएं विधवा हैं। आधी कच्ची उम्र की महिलाएं हैं।
इन आदिवासी महिलाओं का जिक्र सिर्फ इसलिए कर रही कि एक ओर आदिवासी युवा बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण महिलाएं परिवार के भरण-पोषण के लिए अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगाए बैठी हैं। ऐसी महिलाओं का शैक्षणिक, आर्थिक, समाजिक स्तर बहुत ही निम्न है। ऐसे परिवारों में जन्म लेने वाली बेटियों का भविष्य भी अंधकारमय है। संपन्न परिवारों की चंद महिलाओं की स्थिति आर्थिक, समाजिक और शैक्षणिक रूप से भले ही मजबूत हो लेकिन सुदूर इलाकों में रहने वाली महिलाएं आज भी सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति को छोड़ सिर्फ और सिर्फ किसी तरह अपनी आर्थिक स्थिति को ठीक कर लेने के लिए ताउम्र जद्दोजहद कर रही हैं। पत्थर खदान में चुंकि सबसे ज्यादा महिलाएं काम कर रहीं और आदिवासी महिलाओं की संख्या इनमें सबसे अधिक है। और इन महिलाओं की स्थिति नजरअंदाज होती रही है। इसलिए जरूरत है किताबों से दरकिनार कर दिए गए इन मुद्दों व स्थितियों पर भी विचार हो।

Friday, 7 February 2014

झारखंड : नाबालिग मुखबीरियों की आड़ में नक्सलवाद से लड़ती पुलिस

खूंटी  का बुधडीह गांव जहां सरयू पाहन सहित करीब 40 परिवार रहा रहा।
बुधडीह में रास्ते किनारे उन एसपीओ की ससनदिरी जो नक्सलियों द्वारा मारे गए।
जसिन्ता केरकेट्टा, रांची

झारखंड में नक्सलवाद से निपटने के लिए राज्य ही नहीं केंद्र सरकार भी कई तरह के तरीके अपना रही है, जिसमें ग्रीनहंट प्रोजेक्ट, आईपीए प्रोजेक्ट सहित कई आॅपरेशन शामिल हैं। आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को पुरस्कार और पैसे का लालच भी दिया जाता है। इसके अतिरिक्त नक्सलियों का पता लगाने, उनकी गतिविधियेां पर नजर रखने और जरूरत पड़ने पर उनकी हत्या कराने के लिए इन दिनों गांवों के नाबालिग बच्चों का इस्तेमाल भी बतौर मुखबीर या कहें एसपीओ किया जा रहा है। ऐसे एसपीओ में 14 साल से लेकर 16 साल के वैसे बच्चे भी शामिल हैं, जिनकी मदद से नक्सलियों के कुछ जोनल कमांडर पकड़े गए और उनसे कुछ की हत्या भी करवा दी गई है। झारख्ंाड के सभी 24 जिले नक्सलवाद की समस्या से प्रभावित हैं। खूंटी का अड़की प्रखंड नक्सलियों का गढ़ माना जाता है। इस इलाके में नक्सलियों के सबसे प्रमुख व्यक्ति, कुंदन पाहन का दस्ता सक्रिय है। कुंदन पाहन कैसा दिखता है, आज तक किसी को नहीं मालूम। झारखंड पुलिस उसे पकड़ने के लिए अब भी जी जान से जुटी है।

नक्सली और पुलिस दोनों कर रहे बच्चों का इस्तेमाल

इस क्षेत्र में एक ओर नक्सली गांवों से कच्ची उम्र के बच्चों को अपने संगठन में शामिल करने के लिए ले जाते हंै, वहीं पुलिस भी गांवों के बेकार घूमते व विकल्पहीन नाबालिगों को एसपीओ बना कर उनका इस्तेमाल करती है। फर्क सिर्फ इतना ही है कि नक्सली उन्हें जो हथियार देते हैं, वह गैरलाइसेंसी होता है, वहीं पुलिस जो हथियार थमाती है, वह लाइसेंसी। जबकि, सुप्रीम कोर्ट का यह स्पष्ट आदेश है कि खतरनाक कामों के लिए विद्यार्थियों व नाबालिगों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने भी इस मामले में चुप्पी साध रखी है।
नक्सल प्रभावित क्षेत्र में नक्सली और पुलिस मुखबीर, एसपीओ आमने सामने हैं। पुलिस प्रशासन का संरक्षण पाने वाले नाबालिग एसपीओ के हाथों में रिवाल्वर है, जो उनके निर्देश पर नक्सलियों की हत्या तक करते हैं, वहीं मौका मिलते ही नक्सली भी पुलिस की मदद करने वाले इन एसपीओ को अपने निशाने पर लेते हैं। काम निकल जाने पर पुलिस ऐसे बच्चों को एसपीओ मानने से इंकार कर देती है। तब एसपीओ बने बच्चे न घर के रह जाते हैं न घाट के। उनकी पढ़ायी छूट चुकी होती है। नक्सलियों से बचने को मारे-मारे फिरते हैं और अंत में मारे जाते हैं।

मजबूरी का फायदा उठाती पुलिस

ग्रामीण जब नक्सलियेां से प्रताडि़त हो कर पुलिस की शरण में जाते हैं, तब ग्रमीणों को सुरक्षा देने के बजाय पुलिस कहती है कि यदि हमारी मदद करोगे तभी हम तुम्हारी मदद करेंगे। विकल्प नहीं होने के कारण कई बार ग्रामीण पुलिस की मदद करना स्वीकार कर लेते हैं। माता-पिता कुछ कहने की स्थिति में नहीं होते। पढ़ने -लिखने वाले ये लड़के- लड़कियां देखते ही देखते एसपीओ बना लिए जाते हैं। पैसे के साथ उनके हाथों में हथियार थमा दिये जाते हैं।

16 साल के काना को बना लिया एसपीओ

राज्य के खूंटी जिले के खूंटी प्रखंड से 20 किलोमीटर दूर एक गांव चिंचल है। इस गांव के रहने वाले सरजू पहान  जड़ी-बुटियों से लोगों का र्इलाज करते हैं। नक्सली गतिविधियों द्वारा गांव के लोग भी परेशान रहते थे। इसी के खिलाफ सरजू पाहन ने आवाज उठार्इ थी। गांव के लोग दो भागों में बंट रहे थे। उनका आरोप था कि नक्सली गतिविधियों से गांव तक विकास के कार्य नहीं पहुंच पा रहे। उनका मानना है कि नक्सली हिंसा में सबसे ज्यादा ग्रामीण पिसते हैं। सरजू के अनुसार उसका इस तरह बैठकों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना ही कुछ लोगों की आंखों में खटका पैदा करने लगा था।
दो साल पहले गांव के लोग बैठक कर रहे थे अचानक नक्सलियों के झुंड ने आकर उन्हें घेर लिया। सरजू पहान और उसके बेटे काना मुंडा (बदला हुआ नामद्) के हाथ बांध कर वे उन्हें जंगल की ओर ले गये। काना मुंडा की उम्र 16 साल थी। रात होने पर उन्हें लापुंगडीह गांव में रखा गया। दूसरे दिन सुबह दोनों को पहाड़ पर ले गए। वहां नक्सलियों ने मशविरा किया, फिर उन्हें बारिगेड़ा जंगल ले गए। वहां पहुंच कर दो नक्सलियों ने उन्हें खूब पीटा। इसके बाद उन्हें मरंगहदा गांव स्थित शिशु मंदिर स्कूल की ओर ले जाने लगे। वहां उन्हें मार कर फेंकने की योजना थी। रास्ते में दोनों के आगे और पीछे नक्सलियों का दल चल रहा था। मौका पा कर अचानक दोनों जंगल के पेड़ों की ओट लेकर भाग निकले। नक्सलियों ने उनपर गोलियां चलाई लेकिन दोनो पिता-पुत्र झाडि़यों में छिपते हुए किसी तरह भाग निकलने में सफल रहे।
अपने गांव पहुंचने पर गांव के सभी लोग उनके साथ रात भर रहे। खूंटी में रहने वाले उनके परिजनों ने उन्हें शहर जा कर पुलिस को मामले की जानकारी देने की सलाह दी। वे लोग खूंटी गए और पूर्व खूंटी एसपी मनोज कौशिक से मदद मांगी। तब, एसपी मनोज कौशिक ने कहा " हमारी मदद करेंगे तभी हम आपकी मदद कर सकते हैं। " कोई विकल्प नहीं देख कर उन्होंने हामी भर दी।  देखते ही देखते उनका 16 वर्षीय बेटा काना मुंडा एसपीओ बन गया। सरजू कहते हैं " मजबूर नहीं होते तो हमारे बच्चे को एसपीओ बनने की कोई जरूरत नहीं थी।"
काना मुंडा बताता है कि उसे पूर्व खूंटी एसपी मनोज कौशिक ने एसपीओ के रूप में काम करने से पहले 5000 रूपया दिया था और मोबाईल भी। उसे हथियार भी दिया गया और नौकरी का आश्वासन भी मिला। उसने एसपी मनोज कौशिक के साथ दो माह तक काम किया। फिर उसे एडीजी रेजी डुंगडुंग के पास रांची लाया गया। काना मुंडा ने उनके साथ भी एक महीने तक काम किया। किस तरह का काम? पूछने पर उसने बताया कि पुलिस के नक्सल आॅपरेशन में वह साथ जाता था।
काना मुंडा के साथ दो और साथी मंगरा लोहरा और महेश मुंडा भी थे। तीनों ने रांची के एसएसपी प्रवीण कुमार के साथ भी दो-तीन महीने तक काम किया। तीनों लड़के नक्सली संगठनों की गतिविधियों की जानकारी पुलिस को देने लगे। तैमारा घाटी के दुर्दांत नक्सली राजेश मुंडा को पूर्व एसएसपी प्रवीण कुमार के आदेश पर उसने ही मारा था। बाद में पुलिस फोर्स ने आकर शव के सामने तीन-चार फायरिंग की और राजेश मुंडा के इनकाउंटर में मारे जाने की घोषणा कर दी। पूर्व एसएसपी प्रवीण कुमार के  निर्देश पर काना मुंडा ने पुलिस अधिकारी अनूप इंदवार के हत्यारे जोनल कमांडर संतोष मुंडा को भी पकड़वाया था। इस काम के लिए उसे 5000 और दूसरे सदस्यों को 3000 रूपये मिलते थे।

पुलिस के लिए बने दूध की मक्खी

खूंटी के पूर्व एसपी तमिल वाणन के प्रभार लेने पर जब काना मुंडा व उसके साथी उनके पास गए थे तब उन्होंने कहा कि इसका कोई प्रमाण नहीं है कि वे एसपीओ हैं। उनका कहना था अब एसपीओ की ओर से कोई रिपोर्ट नहीं मिलती। इसके बाद इन लड़कों को पैसा मिलना बंद हो गया। काना मुंडा ने इसकी शिकायत एडीजी रेजी डुंगडुंग से की, लेकिन इसके बावजूद बात नहीं बनी। इससे एसपीओ बनकर पुलिस की मदद करने वाले लड़कों में निराशा फैल गयी। काना मुंडा व इलाके के करीब 30-32 लड़के पुलिस की मदद करते थे। इनमें से कई की उम्र 10 से 16 साल की थी। कुछ 20 से 25 साल के युवा भी थे। आज यह पूरी टीम बिखर गयी है। वे अपने गांव नहीं लौट सकते। अब पुलिस को उनकी जरूरत नहीं है और उनका अपना गांव ही उनके लिए सुरक्षित नहीं रह गया। काना मुंडा के परिवार के साथ करीब 40 अन्य परिवारों ने भी अपना गांव चिंचल छोड़ दिया है। उस गांव की अपनी 40 एकड़ जमीन छोड़ कर खूंटी से 4 किलोमीटर दूर बुधडीह गांव में 4 डिसमिल जमीन लेकर रहते हैं।
काना मुंडा ने बताया कि एसपीओ का काम करने वाले कुछ लड़कों की हत्या नक्सलियों ने कर दी है। इनमें से एक रपु मुंडा था जिसे सोयको के सप्ताहिक बाजार में नक्सलियों ने मार डाला। उसके परिवार को सरकार की ओर से कोई मुआवजा नहीं मिला न ही घटना को अंजाम देने वालों को ही पकड़ा गया। उसके दल के  अन्य लड़के इश्वरी टूटी, विक्रम लोहरा व संजय पुर्ती भी नक्सलियों द्वारा मार दिये गये। ऐसे लड़कों की हत्या होने पर उल्टा उन्हें ही नक्सली बताकर पल्ला झाड़ने का काम हुआ है।
नक्सलियों के खिलाफ एसपीओ द्वारा कोई एक्शन लेने पर पुलिस कई बार एसपीओ पर ही कार्रवाई करती है। लेकिन नक्सलियों  द्वारा एसपीओ पर हमलों पर वह कोई कार्रवाई नहीं करती। एसपीओ के रूप में कार्यरत पांच छह युवकों को पुलिस ने खूंटी जेल में भी डाला था। वे एक साल तक जेल में रहे और अब जमानत पर बाहर हैं। काना मुंडा व उनके अन्य साथियों ने पिछले दो साल से एसपीओ का काम छोड़ दिया है। पुलिस ने उन्हें दिये हथियार भी वापस ले लिया है। खूंटी के सेरेंगडीह गांव के डाड़ु मुंडा की उम्र 15 साल की है। उसकी पढ़ाई छूट चुकी है। वह भी काना मुंडा के साथ एसपीओ के रूप में पुलिस की मदद करता था। अब उसने भी एसपीओ का काम छोड़ दिया है। दुलमी गांव के लोदरो पहान की उम्र 17 साल है। उसकी पढ़ाई भी छूट चुकी है। वह भी एसपीओ था और
काना मुंडा के साथ ही काम करता था। अब वह गाय-बैल चराता है।

हथियार देने का प्रावधान नहीं: पूर्व खूंटी एसपी

खूंटी के अड़की प्रखंड में वीरबंकी गांव है, जो ‘लाल कोरीडोर’ का इलाका है। इस इलाके से नक्सलियों के सफाये के लिए अभियान चलाया जा रहा है। अड़की प्रखंड कार्यालय से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर थाना है।  थाने से कुछ दूरी पर पंचायत भवन और मिलिट्री के जवानों का निवासस्थल है। लेकिन इस इलाके में राज्य और केंद्र सरकार के कानून नहीं चलते। पूरा इलाका नक्सलियों के कब्जे में है। वीरबंकी के विभिन्न गांवों से निकल कर अपनी पढ़ायी जारी रखने के लिए खूंटी आने वाली लड़कियों को पुलिस द्वारा पैसे और पुलिस में नौकरी का लालच दिया जाता है। तीन-चार हजार रूपये महीना देने की बात कहकर एसपीओ के रूप में उनका इस्तेमाल होता है। सिर्फ वीरबांकी इलाके में ही करीब छह हजार एसपीओ हैं,  जिनमें से ज्यादातर स्कूल बच्चे हैं।
इसके विपरीत एसपीओ बनाए जाने के संबंध में पूर्व ख्ूांटी एसपी डाॅ.एम तमिल वाणन से बात करने पर वे कहते हैं कि  किसी भी एसपीओ को हथियार देने का प्रावधान नहीं है। एसपीओ
ब्द को लोगों ने आज गलत तरीके से पेकिया है जबकि यह पुलिस के बराबर ही क्ति रखने वाला और समाज में शांति कायम करने में बराबरी का हिस्सेदारी निभाने वाला पोस्ट है। मध्यप्रदेष और छतीसगढ़ की घटनाएं झारखंड से अलग थी। लेकिन झारखंड में एसपीओ को हथियार नहीं दिए जाते। जहां तक एसपीओ बनाने के सवाल हैं पुलिस एक्ट - 17, 18, 19, 20 में इसका प्रावधान है कि हम विशेष परिस्थितियों में एसपीओ रख सकते हैं और उनकी मदद ली जा सकती है। खास कर पुलिस एक्ट 17 उनकी नियुक्ति का उचित करार देता है। जबकि 18,19, 20 उसी से संबंधित है। करीब 120-150 एसपीओ रखने के प्रावधान हैं जिले में। जिसके तहत खूंटी में करीब 70-80 एसपीओ हैं। उम्र के मामले में कहीं कुछ कहा नहीं गया है। उन्होंने कहा एक्ट की बातें ही सबसे महत्वपूर्ण और अह्म होती हैं।
सरयू पाहन, काना मुंडा और उसके साथियेां की पूरी कहानी पूर्व खूंटी एसपी की बातों को झूठलाने और हकीकत बताने के लिए काफी हैं।

 

Sunday, 2 February 2014

कोईलकारो आंदोलन जिंदा है और जिंदा रहेगा हमेशा...........





जसिन्ता केरकेट्टा

एक आंदोलन, जो झारखंड के इतिहास में आने वाले कई सालों तक विस्थापन के खिलाफ लड़ी जाने वाली कई आंदोलनेां के लिए एक माइलस्टोन रहा है, एक प्रेरणा रहा है। वह आंदोलन है कोईलकारो आंदोलन। जिस आंदोलन ने झारखंड में आदिवासियों में अपने समाज के लिए खड़ा होने और लड़ने का आत्मविश्वास भरा। जिसने आदिवासियेां को यह एहसास कराया कि उनकी इजाजत के बिना कोई उन्हें यूं ही उनकी जमीन से बेदखल नहीं कर सकता। 30 सालों के बाद आज कोईलकारो आंदोलन को लोग किस तरह देखते हैं। इस सवाल का जवाब 2 फरवरी को तपकरा गोलीकांड में 
शहीद हुए लोगों की याद में  शहीद दिवस पर लोगों का जुटान दे रहा था। चंद लोगों की भीड़, खाली-खाली सी आंखे बिना किसी बड़े सपने के। हल्की सी मायूसी और चेहरे पर उदासी। उस आंदोलन की आंच अब तपकरा में थोड़ी सी धीमी नजर आयी लेकिन हां एक संकल्प हर किसी ने लिया कि कोईलकारो आंदोलन की चिंगारी सदियों तक जिंदा रहेगी जो विस्थापन के खिलाफ आग लगाने को काफी होगी।  2 फरवरी 2001 को तपकरा गोलीकांड में आठ ग्रामीण मारे गए थे। निहत्थे लोगेां पर अचानक पुलिस ने गोली चलायी थी। हर साल यहां शहीद दिवस तो मनाया जाता है लेकिन आज तक सरकार ने उन लोगों को शहीद घोषित नहीं किया है। इसपर किसी ने सवाल खड़ा नहीं किया।
दयामनी बारला जिसने कोईलकारो आंदोलन में अपनी जवानी झौंकी थी। सुबह से ही बेतहाशा इधर-उधर सबको फोन कर याद दिला रही थी कि आज तपकरा में शहीद दिवस है। थोड़ा झुंझलाई सी..बौखलाई भी...। हर जगह से एक ही जवाब मिला कि कोई किसी न किसी काम में व्यस्त है। ऐसे में स्वयं ही गाड़ी लेकर एक महिला को लेकर वो तपकरा के लिए निकल पड़ी। तुपुदाना के समीप चौक पर आलोका, भुनेश्वर केवट और मुझसे उनकी मुलाकात हुई। हम भी उनकी गाड़ी में लटक गए। खूंटी से कुछ  और तोरपा से भी कुछ लोग गाड़ी में बैठे और फिर गाड़ी तपकरा के रास्ते पर दौड़ने लगी। देखा तपकरा के रास्ते पर चौड़ी सड़के बन रही हैं। ये रास्ते तपकरा में यूं ही तो नहीं बन रहे। 15 साल पहले दूर-दूर तक खेत और खाली जमीन पसरी हुई थी। लेकिन अब कुछ दूर तक इक्के-दुक्के घर नजर आ रहे हैं। गाड़ी धूल उड़ाती हुई आगे बढ़ रही थी। हमने धूल से बचने के लिए गाड़ी के शीशे चढ़ा लिए।
तपकरा में ठीक उसी स्थान पर पहुंचे जहां कभी भारी भीड़ जुटती थी कोईलकारो परियोजना के विरोध में, कुछ लोगों की पुरानी यादें ताजा हो गई। इस आंदोलन का हिस्सा बने लोग बताने लगे '' विशाल जनसमूह....वो वहां पेड़ के नीचे हम अपनी गाड़ी खड़ी कर पैदल उस स्थान तक पहुंचते थे जहां हमें लोगों को संबोधित करना होता था। वो विशाल पीपल का पेड़ अब भी वैसे ही खड़ा है मौन। हां यह पीपल का पेड़ काॅमरेड महेंद्र सिंह के जोशिले भाषणों को भी ऐसे ही मौन रहकर सुन चुका है। आंदोलन की एक-एक घटना का साक्षी। और इसने तपकरा गोली कांड में शहीद लोगों की शहादत भी देखी है।''  पीपल के इसी पेड़ के नीचे पंडाल लगा है। उसी के समीप आठ शहीदों की मिट्टी की कब्र है और एक विशाल पत्थर का स्मारक जिसपर उनके नाम अंकित हैं। आठ शहीदों में स्व.बोड़ा पाहन, स्व.जमाल खान, स्व प्रभु सहाय कंडुलना, स्व.सोमा जोसेफ गुडि़या, स्व.लुकस गुडि़या, स्व. समीर डहंगा, स्व. सुरसेन गुडि़या और स्व सुंदर कंडुलना शामिल थे। मुश्किल से भीड़ 300-400 लोगों की भीड़ होगी। लोगों ने रैली निकाली। रैली गांव का एक चक्कर लगाकर वापस उसी शहीद स्थल पर पहुंची जहां आठ शहीदों को श्रद्धांजलि देनी थी। रैली के दौरान बीच-बीच में दुकानों को बंद कर दुकानदारों को सहयोग देने की बात कही गई। कुछ दुकानदारों ने कहा इसकी सूचना पहले देनी चाहिए। बातें रफा-दफा हुई तो लोगों ने दुकानों के शटर गिराकर अपनी सहमती दर्ज कराई।
रैली शहीद स्थल पर पहुंची शहीद सुंदर कंडुलना की मां सालगी कंडुलना, उसकी ननद सुनिता गुडि़या और बोड़ा पाहन की बहु ने शहीद स्मारक पत्थर, जिसपर आठो शहीदों के नाम अंकित थे, उसे पहले पानी से धोया। उसपर सफेद धागे बांधे। चावल के आटे को पानी से घोलकर उसका छिड़काव किया। स्मारक पत्थर पर तेल का छिड़काव किया। तीन बार उसपर सरसों का तेल मिलाकर पिसे हल्दी का टीका लगाया। उसके बाद फिर तीन बार सिंदूर से टीका लगाया। फिर चावल को तीन बार उछालकर उसपर छिड़का। इसके बाद सफेद माला पहनाकर प्रणाम किया। फिर बारी-बारी से शहीदों के परिजनों के साथ अन्य लोगों ने भी फूलों की माला पहनाकर और धूप-अगरबत्ती जलाकर श्रद्धांजलि अर्पित की। फिर लोग उसी पीपल के पेड़ के समीप पंडाल के आगे दरी पर बैठ गए। पूरे कार्यक्रम का आयोजन कोईलकारो जनसंगठन ने किया था। 
 1955-56 से ही जब कोईलकारो आंदोलन शुरू हुआ जब हवाई सर्वे के बाद  कोईलकारो परियोजना की रूपरेखा तैयार की गई थी। बिहार राज्य विद्युत बोर्ड द्वारा यह परियोजना शुरू किया गया था। भू-अर्जन विभाग ने मापी किया और 1976-77 में काम शुरू हुआ। सर्वे के बाद जब लोगों को पता चला कि 256 रेवेन्यू गांव इसके अंतर्गत डूबेगें तब लोगों ने इसका विरोध करना शुरू किया। 1984 में उच्चतम न्यायालय में एक जनयाचिका दायर की गई कि सरकार सिर्फ एक गांव को माॅडल विलेज के रूप में खड़ा कर दिखाए। कमड़ा का कोचा गांव को माॅडल विलेज बनाने की शर्त रखी गई थी। आज तक वह माॅडल विलेज नहीं बन सका। सरकार इसमें असफल रही। लोगों ने कहा कि ऐसे में सरकार 250 गांवों का पूनर्वास कैसे करेगी। कोईलकारो आंदोलन के 30 साल के बाद भी आज लोग हर साल तपकरा में 5 जुलाई को संकल्प दिवस के रूप में जुटते हैं और 2 फरवरी को शहीद दिवस के रूप में एकत्रित होकर कोईलकारो आंदोलन की यादों को फिर से जिंदा करते हैं और जान देने लेकिन जमीन न देने की बात कहते हैं।
  बातें बहुत हो रही थी। बारी-बारी से एक के बाद एक लोग मंच से भाषण दे रहे थे। इधर भाषण देने वालों की संख्या ज्यों-ज्यों बढ़ रही थी उधर भीड़ धीरे-धीरे छंट रही थी। 4.00 बजते-बजते दरी पर चंद महिलाएं बची रह गई और किनारे-किनारे बैठे पुरूष चुपचाप खिसक गए। बची-खुची चंद महिलाएं जो धीरज का परिचय दे रहीं थी उनके बीच शहीद सुंदर कंडुलना की मां सालगी कंडुलना बैठी हुई थी। पास जाकर बैठने और बात करने की कोशिश करने पर वो मुंडारी में अपनी आपबीती सुनाते हुए कहती हैं कि सुंदर उनका सबसे बड़ा बेटा था। गोली मारने के बाद उसकी मौत के मुआवजे के रूप में कुछ पैसा उन्हें मिला था। कितना? पूछने पर वो कहती हैं, ’’ नहीं मालूम ’’। उसके चार बेटे हैं उसमें से दो पढ़ाई कर रहें हैं। पति के साथ मिलकर वो खेती-बारी का काम करती हैं और साल भर खाने को आनाज हो जाता है। बेटे ने कोईलकारो आंदोलन में जान दिए, इस आंदोलन की यादें जेहन में गड़ गई हैं। फिर वो मौन हो जाती है।
तपकरा गोली कांड के वक्त गांव का एक फौजी सुलेमान जिसने कंबोडिया और मलेशिया में भी बतौर फौजी काम किया है। देश का कोई राज्य नहीं छूटा है जहां उसने भ्रमण न किया हो। वे तपकरा गोली कांड की आंखोदेखी घटना का जिक्र करते हैं - ’’ उन दिनों मैं गांव आया हुआ था। अपने बड़े बेटे की शादी करनी थी। दूसरे गांवों में न्योता बांट कर लौट ही रहा था कि लोगों ने बताया गोली चली है और आठ लोग मरे हैं। यह सुनते ही गांव के कई लोगों के चेहरे आंखों के सामने घूमने लगे थे। कोईल कारो नदी के पानी के लिए सरकार ने तपकरा में लोगों के खून बहाए। ’’ 

 इधर सुलेमान, शहीद सुंदर की फुफू सुनिता गुडि़या और दूसरे लोग पुरानी यादें बांटते हैं....और उधर स्थानीयता पर, झारख्ंाड की राजनीति पर, आदिवासियों के विकास पर भाषण चलता रहता है......। दयामनी दहाड़ रहीं थी ’’ मुंडाओं को डूबाने का काम किया जा रहा है। पूरे राज्य में सिर्फ डैम ही डैम बनेगा तो लोग डूबेंगे या बसेंगे? हम विकास चाहते हैं कि चांडिल डैम का पानी हमारे खेतों तक पहुंचे। कोईल कारो नदी का पानी हमारे मुरझाए जंगलों को, खेतों को हरा भरा बनाए। ’’
फादर स्टेन स्वामी ने कांपते हाथों से माइक पकड़ ली और कहा कि यहां के लोगेां को मारने के कई तरीके अपनाए जा रहे हैं। हर राज्य में स्थानीयता नीति बनी है लेकिन आज तक झारखंड में स्थानीयता नीति नहीं लागू की जा रही। दो लाख नौकरियां हैं और आदिवासी यूवक बेरोजगार घूम रहे हैं। यह एक साजिष है।

 विजय गुडि़या ने कोईलकारो आंदोलन की यादों को ताजा करते हुए कहा जब तक सरकार गजट पारित कर विधिवत घोषणा नहीं करती कोईलकारो परियोजना की समाप्ती का। हमारा संघर्ष चलता रहेगा......चलता रहेगा हमेशा.....।शाम हो रही थी। हम वापस लौट रहे थे और फिर सड़कों की चैड़ाई पर नजरें अटक जाती हैं। सरकार यूं ही पैसा नहीं बहा रहीं सड़कों के चैड़ीकरण पर। कोई तो इरादा है....बातें अब भी खत्म नहीं हुई है। फिर किसी साजिश की बू धूल के साथ उड़-उड़ कर हमारे नाक में दम कर रही थी। कोईलकारों आंदोलन शायद कभी नहीं खत्म होगा। वो जिंदा है आज भी और जिंदा रहेगा हमेशा..... .....।