Thursday, 26 December 2013

हहराती नदी


हहराती नदी

कितने साल लगे 
देखो,
तुम्हारे बंधनों से बाहर निकलने में
तुम्हारे बनाये नियम कायदो
की दीवारों पर सेंध लगाने में
जैसे तुमने बचपन में ही
कोरे कागज की तरह मेरे मन पर
अपने हिसाब से खींची आड़ी-तिरछी लकीरें

लड़की-लड़के में भेद का एहसास कराया
तुमने ही मुझे दिया कई तरह के भ्रम
बड़ी हुई तब भी मुझसे पूछा नहीं कभी
मेरी आत्मा क्या कहना चाहती है
तुमने कभी मेरी कोई पंसद नहीं पूछी
ताउम्र मुझे दृश्य और अदृश्य
अनजानी हथकडि़यों से बांध कर रखा
ताकि मैं तोड़ न सकूं तुम्हारे बनाए
कई रंगों से रंगी-पुती मजबूत दीवारों को
अब वक्त आ गया है कि मैं
मन के बाहर और मन के भीतर का
समाज के इस पार और उस छोर पर
सदियों पहले बांधे उस नदी को
आजाद कर दूं किनारों को तोड़ कर
ताकि हहराती नदियों का उफान
बहा ले जाए तुम्हारे द्वारा गढ़ी रूढि़यों को
जिसमें टूट जाए हजारों बंदियों की बेडि़यां
ताकि वे सीख सके जीवन सागर में तैरना।।

- जसिन्ता केरकेट्टा

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