Monday, 4 November 2013

प्रकृति और स्त्री

प्रकृति और स्त्री

सदियों से तुम डरते रहे प्रकृति से
सोचकर, वो है सृजन के साथ विनाश की भी देवी
तुम उसे कभी समझ नहीं पाए, जैसे
कभी समझ नहीं पाए तुम स्त्री को भी

औजार और सत्ता हाथ में आते ही
पहले किया प्रकृति को तबाह
करने को उन पर एकक्षत्र राज
कभी न सुनी स्त्री की भी आह
सृजनशाीलता की जादुई डिबिया में बंद
कैद रह गयी हमेशा उनकी आवाज,

तुमने स्थापित किया देवियों को
घर से बाहर, बनाकर मंदिर
तुम्हारी बनायी विकसित दुनिया में
ताकि, हमेशा के लिए उन मंदिरों में
पुरातन सभ्यता की देवियां, रह जाएं बंदी,

‘मातृसत्तात्मकता’ के शब्द जाल में कैद
ये देवियां हर साल अलग-अलग नामों से
तुम्हारे ही हाथों से लेती हैं आकार
तुम्हीं उतारते हो उनकी आरती
फिर करते हो
अपने ही हाथों उनका अंतिम संस्कार,

तुमने धरती को खोद डाला
उसके गर्भ से निकालने को
आर्थिक वर्चस्व के लिए संपदा अपार
पीढि़यों पर करने को अपना अधिकार
तुमने अनसुनी कर दी स्त्री की चित्कार

फिर आज कौन सी ताकत तुम्हें
खींच लाती है इन देवियों के दर
वो है सिर्फ और सिर्फ
प्रकृति और स्त्री से तुम्हारा डर।।


- जसिन्ता केरकेटटा
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