Tuesday, 29 October 2013

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झारखंड: विस्थापन के डर के साए में जीते खूंटी के ग्रामीण


झारखंड बने हुए 13 साल हो गए, हर बार आदिवासी जनता के समर्थन से आदिवासी मुख्यमंत्री वाली सरकार ही सत्ता में आई, लेकिन लोगों का विश्वास जीतने में नाकाम रही. जमीन पर निर्भर आदिवासियों को अब वोट के बदले विस्थापन हासिल हो रहा है. आदिवासी इलाकों में एक ओर बालू घाटों के ठेके बाहरी कंपनियों को नहीं देने की मांग जोर पकड़ रही है, वही दूसरी ओर कई इलाकों के ग्रामीण डैम बनाने का जोरदार विरोध भी कर रहे हैं.

झारखंड के खूंटी के गुटजोरा गाांव में बांध के खिलाफ प्रदर्शन करते ग्रामीण
28 अक्टूबर को खूंटी के गुटजोरा गांव में भू-अर्जन विभाग रांची के पदाधिकारी अमरेंद्र कुमार सिंह, खूंटी एसडीओ राम महिपथ रे की बैठक ग्रामीणों के साथ हुई. इसमें खूंटी ब्लाक प्रमुख बेर्नादेत्त भी मौजूद थीं. बड़ी संख्या में पुलिस फोर्स भी थी. नई भूमि अधिग्रहण नीति के तहत 80 प्रतिशत ग्रामवासियों की सहमती जरूरी बताई गई है, पर तजना डैम के विरोध में 95 प्रतिशत गांववाले खड़े हुए.
छह गांव हो जायेंगे जलमग्न
खूंटी व कर्रा प्रखंड की सीमा पर तजना नदी पर सरकार 2012 से डैम बनाने की तैयारी कर रही है. डैम बनाने का टेंडर अवंतिका कंपनी को दिया गया है. डैम के बनने से छह गांव सिलादोन, गुटजोरा, कुदलूम, ईठेटोली, हारूहप्पा और धानामुंजी गांव शामिल हैं, पूरी तरह डूब जायेंगे. जलमग्न होने वाली ज्यादातर जमीन खेती योग्य है. गुटजोरा और सिलादोन में करीब 750 परिवार रहते हैं. अन्य चार गांवों में करीब 400 से अधिक परिवार हैं. भू-अर्जन विभाग के पदाधिकारी, अमरेंद्र कुमार सिंह ने बताया कि अभी सभी गांवों का सर्वे नहीं किया गया है. सिर्फ दो गांव, सिलादोन और गुटजोरा का ही सर्वे हुआ है. इसके आधार पर एक प्रस्तावित खाका तैयार किया गया है कि कितनी जमीन जलमग्न होगी. इस डैम के बनने से सिंचाई व्यवस्था बेहतर हो जायेगी. तजना डैम की उंचाई 55 फीट और लंबाई लगभग दो किलोमीटर होगी.
मुआवजा, नौकरी पर कोई समझौता नहीं हुआ
मध्यम सिंचाई परियोजना, पुनर्वास विभाग से मिली जानकारी के अनुसार मुआवजा की दर और नौकरी के बाबत ग्रामीणों के साथ सरकारी स्तर पर कोई समझौता नहीं हुआ है. भू-अर्जन के लिए कुल 1333.78 एकड़ जमीन प्रस्तावित है.
खूंटी नालेज सिटी के लिए है ये कवायद
तजना डैम के विरोध में ग्रामीणों का साथ देने वाली समाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला कहती हैं कि इस डैम का निर्माण खूंटी में प्रस्तावित नालेज सिटी को ध्यान में रखकर किया जाना है.  इसका पानी सीधा नालेज सिटी के लोगों को मिलेगा. विस्थापित हुए ग्रामीणों के पास खेती करने के लिए कोई जमीन नहीं होगी, इसलिए वे इस डैम में नौका चलाएंगे.  सरकार ने डैम में नौका चालन व मछली पालन की बात कही है. नालेज सिटी के लोग डैम में नौका विहार का आनंद लेने आएंगे. लोगों को मजबूरन अपना पेशा बदलना होगा. वे खेती छोड़कर मछली पालन करेंगे. उनके अनुसार नालेज सिटी बनाने के लिए 2010 में खूंटी में जमीन का अधिग्रहण शुरू हो गया था. नालेज सिटी के लिए जरूरी करीब 1200 एकड़ जमीन में अब तक 400 एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर लिया गया है.
वे कहती हैं कि सरकार खुद अपने नियम -कानूनों का पालन नहीं कर रही. डैम के लिए लोगों का समर्थन पाने के लिए सरकारी अधिकारियों द्वारा कोशिश की जाएगी कि दो बड़े गांव सिलादोन और गुटजोरा के लोगों का समर्थन हासिल कर लिया जाए. यदि इन दो गांव के लोगों का समर्थन मिल गया, तो बाकि गांवों को पुलिस फोर्स के माध्यम से मनवा लिया जायेगा. यह गांव वालों के अस्तित्व का सवाल है. वोट के बदले आदिवासियों को विस्थापन मिल रहा है.
क्या कहते हैं ग्रामीण
धानामुंजी गांव के ग्राम प्रधान तड़कन हेरेंज कहते हैं कि यह संघर्ष आज का नहीं है. दो साल से विरोध जारी है. डैम बनने से यहां के लोगों की कृषि योग्य भूमि चली जाएगी. लोगों के हाथों से खेत निकल जाएंगे. ऐसे में मुआवजे के पैसे हाथ में आने के बाद भी लोग दर-दर भटकेंगे.  तजना डैम विरोध जनसंगठन के अध्यक्ष घसिया मुंडा कहते हैं कि 28 अक्टूबर को गुटजोरा में और 30 अक्टूबर को सिलादोन में सरकारी अधिकारी गांव वालों के साथ बैठक करेंगे. उन्हीं दिनों में गांव में हाट-बाजार भी लगता है. इसकी सूचना गांव वालों को दे दी गई है. सरकारी अधिकारी चाहते हैं कि ज्यादातर लोग इस बैठक में शामिल नहीं हो पाएं. कम लोगों को मुआवजे का लालच देकर डैम बनाने के लिए राजी करना उनके लिए आसान होगा.
जमीन देने के मसले पर अब भी रैयतों के बीच सहमती नहीं बन पाई है. ग्रामीणों को नौकरी मिलेगी या नहीं, इसपर कोई चर्चा नहीं हुई है. दो गांवों का सर्वे करने के बाद एक अनुमानित आंकड़ा तैयार किया गया है कि डैम के लिए कितनी जमीनें लेनी हैं. इसी प्रस्तावित आंकड़े के हिसाब से गांव वालों से जमीन की मांग की गई है.  हारूहप्पा गांव के प्रधान जोलेन सांगा ने कहा कि इस क्षेत्र में 1999 के पहले से ही डैम बनाने का प्रयास किया जा रहा था. गांव के लोग तब से इसके खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं.  यदि तजना नदी पर डैम बना तो लोग अपनी जमीन से विस्थापित हो जायेंगे.  और तब झारखंड की नदियां भी विकराल रूप धारण करेंगी और यहां भी उत्तराखंड जैसी घटनाएं होंगी.  पर सरकार अपने स्वार्थ के कारण गांव के लोगों की बली चढ़ाने को तैयार है.
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