Friday, 11 October 2013

MERI AWKAT

MERI AWKAT 

वो लड़की याद आती है मुझे
नंगे पाव
सर पर
इमली की टोकरी ढोकर
हाट की ओर जाती हुर्इ,
फिर बनाती है
पांच खाना
मुटठी  भर इमली
डाल कर
सखुआ पत्तों के दोने में,
और चिल्लाती है
दो रूपये में इमली ले लो

लोग आते है
सूंघते हैं
चखते हैं उठा कर
और आगे निकल जाते हैं
कहकर
खटठी है इमली!

बहुत इंतजार के बाद
षहर की औरतों का
झुंड गुजरा वहां से
मुंह में आए
पानी को चूने से बचाकर
उनमें से एक औरत
एक खाने की र्इमली
ले गर्इ खरीदकर
थमा गर्इ हाथों में
बस दो रूपये
दूर ढलते सूरज को
देखती है वो
चार खानों में बची
र्इमली को ताकती है
बस एक टक,
मुटठी में सिर्फ दो ही रूपये हैं
शाम ढलने तक
सूरज के ढलते ही
हाट उठने लगा
अब गली के गुंडे पीकर
घूमेंगे हाट में,
करेंगे बेवजह बहस,
उठाकर अपनी टोकरी
देखती है
उन दो रूपयों को
सोचती है
काश! र्इमली खटटी न होती

हर बार
निकल कर
सामने आ जाती है
वो लड़की
जब
धूल-झाड़ कर निकालती हूं
बक्से से
अपनी चंद पुरानी तस्वीरें
और वो दो रूपये
जो आज भी सहेजे हैं
डीबिया में
उसे अब तक रखा है
अपने साथ
झूठ और भ्रम से भरी दुनिया में
वो डीबिया बताती रहे
क्या है मेरी औकात।


by-Jacinta kerketta



 

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