Saturday, 12 October 2013

किसके लिए ये बलिदान


किसके लिए ये बलिदान

कच्ची उम्र में
अपनी आंखों से जो देखा
आज भी
जेहन में जिंदा है वह मंजर
तार से बंधी
और
छड़ से पिटती मां
हां यही अतीत
सीने में
चुभता है बनकर खंजर
खिड़की से समाज
देख रहा था नजारा
जो चल रहा था
मेरे घर के अंदर
कर्इ सालों से
वो दर्द मुझे
कर रहा है छलनी
आंखें हो जाती हैं नम
और
दिल हो जाता है बंजर,
सोचती हूं
काश! मेरे नन्हे हाथों में
तब
कोर्इ दैवीय शकित होती
बचा पाती उसे
उसके ही पति से
मैंने देखा है
हर बार उन्हें
जलील होकर टूटते हुए,
और
खुद को पाया सिसकते हुए
बिखरे कांच के
टूटे टुकड़ों को समेटते हुए,
बचपन पटा है
ऐसे ही हादसों से
हर तारीख हर दिन
तब
कितना गमगीन लगा था
हर कतरा आषूंओं का
कुछ ज्यादा ही
नमकीन लगा था
बार - बार यह ख्याल आता है
जो ताउम्र समाज
और
उसके व्यवस्था पर
अड़ा होता है
ऐसे हालात में भी
किस स्त्री
के साथ उसका
समाज खड़ा होता है
वह देखता रहता है
सारा खेल
मुस्कुराता है
अपनी व्यवस्था पर
घुटती हैं इंसानी रूहें
जिंदगी भर चुपचाप
इसी को समाज कहता है
नारी का
परिवार के लिए बलिदान
ताकि बची रहे
इस व्यवस्था की SHAN।।


by-Jacinta kerketta



 

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