Friday, 11 October 2013

अब भी खड़े हैं अकेले


         अब भी खड़े हैं अकेले

कुछ गर्म सी, नमकीन आशुंओं की धार
क्यों रात भर बहती रहीं पलकों के किनारे,
ठंडी सी सासें चढती-उतरती रही
क्यों बेसुध सी चलने वाली सिसकियों के सहारे ।।
एक पल को लगता था जैसे
उम्र कटेगी हां इसी प्यार में,
फिर क्या हुआ क्या पता
जैसे नैया पलट गर्इ बीच मझधार में ।।
बस रह गर्इ है बीते लम्हों के साथ
एक दूजे के लिए मांगी कोर्इ सच्ची दुआ,
बाकी तो सब बातें थी
उड़ गर्इ हो जैसे धुप के पड़ते ही
जैसे उड़ जाती है
हलक से निकलने वाली सांसों की गर्म हवा ।।
बातें..बातें..बस बातें ही तो होती है दिन रात
क्या रखा होता है इन बातों में,
बस दिन अच्छा गुजरता है
उम्र कट जाती है चंद मुलाकातों में ।।
भ्रम का कोर्इ पर्दा रहता है उन दिनों
जैसे जादू सा सर-आखों पर,
वक्त बदलते ही मंजिलें बदल जाती है
और हम चलते रहते हैं पुरानी राहों पर ।।
गर्म एहसास बाकी हैं हथेलियों पर
जिसे लंबे समय तक थामा हो
किसी ने कभी प्यार में,
वो सपना था या हकिकत
पलट कर देखा तो पाया
अब भी अकेले खड़े हैं भरी बाजार में।।

by- Jacinta kerketta

 
 

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