Friday, 11 October 2013

दीवार

 
दीवार

सदियों पहले कोलाहलो से
दूर
खुद के एकांत के लिए
एक महफूज व्यवस्था के लिए
उठा दी गई
चारो ओर की दीवारें
सालों बाद आज
अपने ही अंदर की
खामोशी और सन्नाटे से 

डरकर भागते लोग
इसी चारदिवारी से
करते हैं बातें
हिलाते हैं, पीटते हैं
इन दीवारों को
कि इनके पीछे
अब घुटता है दम
ये भांत-भांत की दीवारें
धर्म, जात-पात और
उंच-नीच की
नहीं ढहती हैं
दफन हो रहीं हैं चीखें
महिलाएं और मासूम बच्चों की
और
हर वह शख्स
जो सन्नाटे के कैद में
घुटता है
चिपकते जा रहे हैं
उनके दर्द
इन दीवारों से
परत दर परत
मांगती हैं भूखी आत्माएं
इंसाफ
लेकिन इसका ढहना
मुश्किल है क्योंकि
सदियों से
कभी न मरने वाले
पिषाच
इन दीवारों को घेरे हुए
इसकी हिफाजत में
जिंदा हैं
आज भी हैं
और
जिंदा रहेंगे
आने वाली कई सदी तक।

by-Jacinta kerketta

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