Friday, 11 October 2013

किताबों में ढूंढती हूं

किताबों में ढूंढती हूं

ढूंढती हूं अपनी
जमीन का इतिहास
बंजर हो चुकी
मिटटी की फिकी महक ं
पतझड़ के पीले पततों में
नहीं दिखती अब वो हरियाली
क्यों नहीं
दिखते वो हरे-लहलहाते खेत
वो उड़ता हुआ चिड़ीयों का झुंड
वो खेतों की पगडंडियों पर
फुदकता जोड़ा मैना
और
हवा में लहराते सनर्इ के फूल
छू कर मन को
भींगों गया था जो
वो ओस की चंद बूंदें
वो चिड़ीयों का उड़ता झुंड
कहां गुम हो गया
वो मेरा आशियाना
ऐसा लगता है सब कुछ था
सच सा लगने वाला सपना
क्यों मेरी खुषियां
किसी को भाती नहीं
लूट लेते हैं मेरी जमीन
छीन लेते हैं हमारी हरियाली
हो जाती है वो प्यारी मैंना
लगंड़ी
और दिखता है बाजारों में
डिब्बा बंद सनर्इ का फूल
मेरा मन
ढूंढता है मेड़ों पर बिखरी यादें
टूट रही है
इन राहों पर
खुद से किए
कर्इ पुराने वादे
मैं चंद पैसों की नौकरी में
दिन भर फिरती हूं
धूल फांकती हुर्इ शहर में
खुद को कैद कर लेती हूं
हर षाम कमरे में
और
हवा के झोकों से
फड़फड़ाते किताब के
पन्नों के बीच
ढूढ़ती हूं
अपनी जमीन इतिहास।
by-Jacinta kerketta

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