Sunday, 27 October 2013

मिटटी के पुतले को जीना सिखा



मिटटी के पुतले को जीना सिखा

ओ आकाश तेरी गोद से
जंगल के इस हरी आंचल में
छनकर जमीं पर गिरने वाली
बारिश की बूंदे 

करती हैं कुछ क्षण पत्तों से गुफ्तगू
वो सुनाती है आकाश की गोद में
पलने का सुख
बादलों और हवाओं के झूले में
झूलने की अपनी अविस्मरणीय यादें

फिर वो बताती हैं अपने जीवन का सच
मिट्टी में गिरकर उसका
गुम हो जाना कहीं गहरे
जीवन देने जड़ चेतन को


ओ आकाश, ओ बारिश की बूंदें
मिट्टी में मिल जाने की
कहानी हमारी भी एक सी ही है
सृष्टि की हर चीज जीती है
गैरों के लिए

पर एक हम हैं
जो अपने स्वार्थ की खातिर
खो देते हैं हर बार अपना ईमान
हमें ऐसे ही जीवन पर है गुमान

सिर्फ और सिर्फ अपनी खुशी के लिए
हम जीवन भर बने रहते हैं बेइमान

ओ आकाश, ओ बारिश की बूंदे
तेरे आगोश में हैं छुपे
कई राज हमें बता
कि मिट्टी के इस पुतले को भी
जीना सिखा।।

- जसिन्ता केरकेटटा

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