Friday, 11 October 2013

गुलाम

गुलाम

वो तुम्हारे हक की
बात बोलेंगे
तुम्हें अपने हिसाब से
अपनी तराजू पर तोलेंगे
तुम अपनी तरफ
लोगों की देख जमात
यूं खुशी से मत झूमना
कि झूम के
उनके चरण-कमल
लोट-लोट के मत चूमना,
कि वे तुम्हारे ही हक में
बोलेंगे
तुम्हारे दर्दो के
तुमसे भी ज्यादा
राज खोलेंगे,
तुम्हें देंगे मंच जहां
अपनी लाचारी खुलकर
बोलना
बोलना भी ऐसे कि
दिल के कोने-कोने से
दर्द के सारे पिटारे खोलना
खोलना भी लोगों को देखकर
बेवजह-बेअसर बातें न कहना
कहना ऐसे कि सामने वाले को
जख्मी करें तुम्हारा दर्द झेलना,
फिर वो तुम्हारे ही दर्द की
करेंगे व्याख्या
दिखाएंगे तुम जैसे
दर्दे दिल वालों की
भारी संख्या,
फिर वो
तुम्हें धरना प्रदर्शन पर बिठाएंगे
तुम्हारे लिए मंच पर
चिखेंगे-चिल्लाएगें
जब वे चीखेंगे-चिल्लाएंगे
तुम्हें चुपचाप है रहना
जब कहा जाए तुमसे
कुछ कहने को
तब रो-रो कर
तुम हाल सुनाना
वो तुम्हे दिल्ली लेकर जाएंगे
तुम चददर-बिस्तर समेट कर
चल देना
वहां भी अपने दर्दे दास्तान
तुम्हें है
सबको बताना
वो बार-बार कहेंगे तुमसे
मंजिल अभी मिली नहीं है
अभी तो
सरकार की तख्ती भी
हिली नहीं है
ये हक की जंग है
तुम्हें नहीं है
हिम्मत हारना
हिम्मत भी ऐसे रखना
कि अंधेरे में
उम्मीद की चिरागे जलाकर
उनके लिए कम से कम
जिंदा रहना,
कुछ बातों को छोड़कर
बाकी बातें होंगी तमाम
समझना होगा उन अनकहे
 इषारों को
किसके मुंह में छूरी
और बगल में है राम
हर कोषिष होगी यही
कि
किसी न किसी तरह
किसी न किसी के,
हर सदी हर काल में
बस बने रहो तुम गुलाम।।


by-Jacinta kerketta


 

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