Friday, 11 October 2013

क्या लौटा सकोगे?

क्या लौटा सकोगे?

मेरे गांव में आज
क्यों दूर तक पसरा
वो खालीपन है
कट गए हैं वो पेड़ पुरानेे
और
फैली दूर तक विरानी है
वो नदी प्यारी
सिमट रही जो रेत की गोद में
उठते हैं धुंए अब सीने से
पहाड़ों के
जलता है जंगल जार-जार
फटते हैं फिर
काले सोने की तलाश में
मासूम धरती मां के कोंख से शोले
भाग रहे हैं सब जंगल से
छोड़ कर मिटटी के घर
ढूंढ रहे हैं कंक्रीट के शहर में
एक अदद छत
छिपाने को अपना सर
सोंधी गांव की मिटटी से
अब आती है बारूद की महक
गुम हो गर्इ है मेरे जंगल से
अब सोनी चीडि़यों की चहक
मेरी जमात में षामिल होने से पहले
सोचो क्या लौटा सकोगे?
मेरे गांव की वो नदी की निश्चछलता
मेरे जंगल में महुएं और
आम के बौरों की खुशबू
वो कच्ची पगडंडी
और
सूरज की रोशनी में
मेरे खेतों की
मिटटी की चमक
मेरी भाषा में छपी मिठास
और मेरे हृदय का दृढं विष्वास।।

by-Jacinta kerketta
 

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