Friday, 11 October 2013

रीसता हुआ दर्द

रीसता हुआ दर्द

मैं देख रहा हूं हर दिन
मां जाती है
पर
हाथों में उसके खुरपी और डलिया की जगह
तीर और कमान है
भागता हुआ मां के पीछे पगडंडी तक पहुंच
देखता हूं दूर तक आदमीयों का झुंड
जाकर उस भीड़ में गुम हो जाती है मां
बदहवाश दौड़ता हुआ मैं
गीली मिटटी में फंस जाता हूं
वो भीड़ नारे लगाते हुए मेरी नजरों से दूर निकल जाती है
रात मां लौट आती है
उसके सिर पर सफेद पटटी बंधी थी
और
खून रिस रहा था
मैं मुटूर-मुटूर बस उसे ताक रहा था
कहीं वो रो तो नहीं रही?
नहीं वो रो नहीं रही
उसने बड़े प्यार से मुझे अपने गोद में लेकर कहा
ये जंग अपनी जमीन और अपने आप को बचाने की है
और यह तब तक नहीं थमेगी
जब तक
कि यह लूट न बंद हो जाए
मेरे बाद तुम्हें भी लड़ना होगा
कह कर मां निकल पड़ती है पड़ोसी के घर
बनाने को अगली रणनीति
मैं भी साथ हो लेता हूं
अगले दिन मां तीर कमान लिए निकल पड़ती
देर रात घर न लौटने पर
सिसकता हुआ मां को ढूंढता हूं मैं
तब भी जाने क्यों मां नहीं आर्इ
कर्इ साल बाद
जाना मैंने
लेकर वो तीर कमान
घर लौटने के लिए नहीं निकली थी
 आज मैं लड़ रहा हूं
 मां के सपने को बचाने के लिए
 मैं लड़ रहा हूं उन सारे दर्दो के साथ
जो मेरे सीने में कहीं गहरे गड़े है
लड़ रहा हूं कर्इ सालों से
लोगों को ये बस लड़ार्इ लगती है
नहीं दिखता मेरा सदियों पुराना जख्म
नहीं दिखता मेरा सदियों पुराना दर्द
नहीं दिखता मेरी सूखी हुर्इ आंखें
उन्हें दिखते हैं सिर्फ मेरी जमीन, जंगल
 मेरे खेत और कुछ नहीं......................।


by-Jacinta kerketta

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