Friday, 11 October 2013

परींदा

        परींदा

न जाने कितने सालों से है बंद
मेरे कमरे की खिड़कियां
बिजली की रोशनी में
आर्इने में देखती हूं
अपना रूप
गलती से कभी किसी ने
खोली खिड़कियां तो
चुभती है बाहर की धूप
उस कमरे के अंदर
दिन और रातें है भारी
कभी अंदर तो कभी बाहर
वर्षो से है सुकून से जीने की
एक जददोजहोद जारी
सांसे चलती है धीमी-धीमी
लड़ता हुआ खुद से मेरा वजूद
कुछ इस तरह जिंदा है
जैसे कोटरे में पानी
और पींजरे में कोर्इ परींदा है।


by-Jacinta kerketta




 

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