Sunday, 27 October 2013

दर्द का मोम

दर्द का मोम

रात, किसी जलती मोमबत्ती
के पिघलते हुए 
गर्म मोम की मानिंद
वो ताउम्र पिघलती रही
किसी अनजाने दर्द से जलती रही
वो जलना उसका कितना खमोश है

आंखों के काले घेरे के नीचे
मानो जीवन का अंधेरा घिरता है
और सर्द होती अपने वजूद पर
एक गमगीन चादर लपेटे वो
सिर्फ सबकी खुशी की
एक खामोश सी ख्वाहिश लिए
जन्म से मृत्युष्य्या तक
मोम की तरह पिघलती है
आंचल के पीछे छिपाए
अपने ही कई जख्मों के बीच
वो हर दिन गलती है

बहते हुए उस पिघले मोम में
उसकी अपनी जिदंगी कुछ ऐसे
होती है फंसी, जैसे कोई
फतिंगा फंस गया हो
मोम के गर्म गीली दीवारों से
वो दीवारें उनकी जिंदगी
के चारों ओर खिंची
परिवार की, समाज की
बनी लक्ष्मण की लकीर है
कि उस घेरे के अंदर
बना दी गई वो खुद एक फकीर है

उसकी हर खामोश चीख में
कोई चुभता हुआ दर्द जगा है
वो बात-बात पर मुस्कुराती है
मानो यह दर्द उसका कोई सगा है
वो हर दिन उस दर्द के
गहरे और गहरे उतरती है
उसे पूरी तरह पा लेने को
उसे पूरी तरह जी लेने को
फिर फौलाद बनकर
उस सागर से निकलती है

कौन कहता है
यह दर्द एक सजा है
जीने वाले जानते हैं
इसमें जीने का क्या मजा है
जमाने ने आग की भांति
दर्द दे देकर तपते लोहे की तरह
उसे फौलाद बना दिया है
वह डिगती नहीं है अब
व्यवस्था के हर प्रहार से
वह लड़ती है और लड़ती रहेगी
समाज के हर अत्याचार से।।

by - jacinta kerketta

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