Saturday, 19 October 2013

क्यों भा रहे ये कच्चे मकान?




क्यों भा रहे ये कच्चे मकान?

लूट कर हमारी जमीन
उजाड़ कर
हमारे मिटटी के घरों को
बना दिया कंक्रीट का जंगल
अब गांवों से निकल
जमीन मालिक भटक रहे
इस कंक्रीट के जंगल में
इधर - उधर,
उजाड़कर सबकुछ
फिर शहर से वही लोग
लौट रहे हमारे
असली जंगलों में, गांवों में,

लिखने को किताबें
हमारी उसी लुटी जिंदगियों पर
विकास की मार से उजड़े
अधजले घरों से
उठते धुओं की कहानी
लिखने को
हमारे विस्थापन का दर्द
बहनों की लुट चुकी
अश्मत पर लेख उनकी जुबानी
आकर शहर से
फिर नापने को हमारी जमीन
हमारे जंगल का विस्तार
हमारे मिटटी के घरेां की उंचार्इ
हमारे चौखटों की चौड़ार्इ
लगाने को हिसाब
ताकि फिर लूटा जा सके
हर वो बेशकीमती तिनका
जिन्हें जोड़ जोड़ कर
हमारे पूवर्जो ने रचा है
एक इतिहास,

उन्हें भाता है
हमारा मिटटी के घर में होना
हमारा कच्ची जमीन पर सोना
हमारा चुप रहना
हमारा र्इमानदार होना
क्योंकि.....
बर्इमानी पर जीने-खाने वालों को
चाहिए एक बेहद र्इमानदार, कर्मठ
सरल इंसान
जो सिर्फ इशारा समझे
बिना सवाल पूछे करे काम
जो बन सके बेहतर मोहरा
जिसकी आड़ में चलती रहे
उनकी दुकान
ताकि सबसे उंचा रहे
बर्इमानी की जमीं पर
बना उनका भवन आलीशान
इसलिए भाता है हर किसी को
हमारा जंगल
और गांव के ये कच्चे मकान।।

- जसिन्ता केरकेटटा

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