Friday, 11 October 2013

इंसान की तरह

इंसान की तरह

क्यों मेरी परछार्इ को भी तुमने
अपने साये से छुपाए रखा है
मैं चुप हूं, सदियों से
अपने सीने में कर्इ राज दबाए रखा है,
तुम सिकंदर की तरह
दुनिया नहीं जीत पाए तो
घर के अंदर मुझे ही
कैदी बनाए रखा है,
मैं चुप हूं
क्योंकि थोड़ा क्रोध
किसी प्रलय के लिए बचाए रखा है,
जब-जब मैंने चाहा 
तुम्हारे नियमों को लांघ लूं
तुमने उस पार मेरे लिए
कांटों के रास्ते बिछाए रखा है
कभी चाहा
दायरे से बाहर कदम रखने की
तुमने मुझपर
चरित्रहीनता का दाग लगाए रखा है,
तुम्हारा झूठ बोलना,
तुम्हारा धोखा देना,
तुम्हारा किसी की
इज्जत आबरू से खेलना
तुम्हें गलत साबित नहीं कर पाता है
और
मेरा किसी से हंस कर बात कर लेना
मुझे चरित्रहीन के कठघरे में
खड़ा कर जाता है
तुमने हर तर्क से
अपने को बचाए रखा है
तुम कहते हो
उस ताले को कौन पूछता है
जो हर चाबी से खुल जाए
पर तुम उस चाबी को
मास्टर की कहते हो
जिस चाबी से हर ताला खुल जाए,
मैं बहुत कुछ कहना चाहती हूं
पर तुम सच नहीं सुनना चाहते
इसलिए
कर्इ फतवा सबको सुनाए रखा है
तुम्हें डर है मैं आगे न निकल जाउं
इसलिए
स्त्री कमजोर है यही, सदियों से
मेरे अवचेतन मन में बिठाए रखा है,
मैं अब
न तो गुलाम हूं न कभी रहूंगी
मेरी आवाज अब जाएगी दूर तलक
तुम्हारे कानों को भेदेगी
भोर के अजान की तरह
मैं अब लडूंगी, लडती रहूंगी
तुम्हारी बनार्इ
इस व्यवस्था से कि
मुझे जीना है इस धरती पर
एक इंसान की तरह।।
by-Jacinta kerketta
 

 

1 comment:

  1. काफी अच्छी कविताएं हैं...

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