Monday, 21 October 2013

वो लेगी बदला तुम्हारे शहर से



वो लेगी बदला तुम्हारे शहर से

हमारे आंगन में सालों से
खड़े ये साल के पेड़
कटते हैं गैरों के हाथों
कैसी बेरहमी से
वर्षो से अड़े, तने
धूप, ठंड से बचाते हमें
इन देवता समान वृ़क्षों के
सीने पर चलती है आरी
और ट्रक के ट्रक
उठा ले जाते हैं जंगल माफिया
कर लेते हैं
पेड़ों की इन लाशों का सौदा
जंगलों के कथित रखवालों से,

सुनार्इ पड़ती है दिन रात
बारूदों से चटटानों के टूटने
की तेज आवाजें
बच्चे-बूढे बहरे हो चुके हैं
बाकी मर रहे हैं आहिस्ता आहिस्ता
महूंए की खुशबू के साथ
बारूदों को ले ले कर सांस

प्रकृति ने दी है आजादी
हमारे जंगल में बहती नदियों को
अपने अंदाज में बहने की
दिल की हर बात हंस हंस कर
खुशी से इतरा कर कहने की
वो नदियां अब कराहती हैं
घुट-घुट कर बहती है
अपने जहरीले पानी के साथ
आंशू बहाती है देखकर कि
गांव के बच्चे-बूढे सभी डरते हैं
कोर्इ जाता नहीं अब उसके पास
हर तरफ
घुटन है सड़ांध है इन लाशों की
लाशें नदियों, जंगलों, पड़ों की

देख रहा है ये आसमां
देख रही है ये प्रकृति
वो भूलती नहीं है अपना रास्ता
वो अपने सब्र का इमितहा ले रही
इन लाशों का वो लेंगी बदला
तब सोचो तुम्हारी कितनी लाशें
बहेंगी नदियों में, गुम हो जाएंगी
तुम्हारी ही खोदी सुरंगों में
बचा सकते हो तो बचा लो
खुद को उसके कहर से
वो लौटेगी और लेगी बदला
तुम्हारे इस शहर से।।
- जसिन्ता केरकेटटा

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