Saturday, 12 October 2013

जात

जात

गांव से निकल कर
जब आर्इ शहर में
डर लगता था हर
किसी की परछार्इ से
गैरों की भीड़ में जब
अपनों ने भी हाथ बढ़ाया
तो डर से
हर किसी को ठुकराया
रास्ते पथरीले थे
पर हमने
अकेले चलना ही
मुनासिब समझा
फिर भी
कुछ शुभचिंतक मिले
मिलकर जब लगा
कोर्इ तो है अपने साथ
अपनी जाति-बिरादरी का देख
जब जगा थोड़ा सा विश्वास
तब एक दिन
बड़ी तंगी में हमने
उनके घर का रूख किया
समाज में
उनकी बड़ी ख्याती थी
लेकिन उनके घर में
हमने अपने विश्वासों को
दरकते हुए देखा
बाहर जो दिखता है
उस काले झीने पर्दे को
सरकते हुए देखा
खाली हाथ लौटते वक्त
बस समझ में आर्इ
एक ही बात
मर्दो की
होती है बस
एक ही जात।

by-Jacinta kerketta

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