Thursday, 10 October 2013

विकास

JACINTA KERKETTA


विकास
शहर से अब जंगलों की ओर
उतरता है हाथियों का झुंड
जब घटने लगता है 
शहर में आश्रय
पांव पसारने को 
जब उन्हें चाहिए होती है 
विस्तृत जमीन
झुंड उतरता है 
जंगलों में, गांवों में
किसी न किसी खास 
आपरेशन के बहाने
किसी न किसी 
खास मकसद से 
किसी खास 
मालिक के इशारे पर
झुंड पहले उत्पात मचाता है
तोड़ डालता है 
लोगों की हडडी पसली
कुचल देता है 
लोगों की आत्माओं को
और चल देता है 
शहर की ओर
झूमता हुआ 
टूटे-फुटे घरों के 
अधजले चुल्हों से
जब
उठता है दर्द का धुंआ
तब 
हाथियों का मालिक 
लेकर विकास की रोटियां 
चला आता है जंगलों में
कर लेता है 
सुरक्षा के नाम पर 
जंगल पर कब्जा
और खड़े करता है 
अपने पहरेदार
दर्द से कराहते अधमरे लोग
उठते हैं और चाटते हैं
विकास के नाम पर
उनके जले पर 
छिड़का गया नमक
यह सोच कर कि 
शायद यह नमक
उनके बेस्वाद हो चुके 
जीवन में 
थोड़ा सा स्वाद भर सके।

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